Tuesday, August 22, 2017

विविधता में एकता ही ' शिव ' अर्थात 'भारत ' देश है ------ विजय राजबली माथुर





"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं. 
"भक्ति"  : 
आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ? 

विकृति :

महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .
काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.जबसे आर्यसमाज में संघ अनुयायी छा गए हैं आर्यसमाज दयानन्द सरस्वती के मार्ग से भटक गया है और इसी लिए उसमें उपरोक्त विकृति पनप सकीं .

दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.

शिव : ज्ञान -विज्ञान का प्रदाता  : :

आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैं तो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 

नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन ******

'शैव' व 'वैष्णव' दृष्टिकोण की बात कुछ विद्वान उठाते हैं तो कुछ प्रत्यक्ष पोंगापंथ का समर्थन करते हैं तो कुछ 'नास्तिक' अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथ को ही पुष्ट करते हैं। सार यह कि 'सत्य ' को साधारण जन के सामने न आने देना ही इनका लक्ष्य होता है। सावन या श्रावण मास में सोमवार के दिन 'शिव' पर जल चढ़ाने के नाम पर, शिव रात्रि पर भी तांडव करना और साधारण जनता का उत्पीड़न करना इन पोंगापंथियों का गोरख धंधा है। 

'परिक्रमा' क्या थी ?: 


वस्तुतः प्राचीन काल में जब छोटे छोटे नगर राज्य (CITY STATES) थे और वर्षा काल में साधारण जन 'कृषि कार्य' में व्यस्त होता था तब शासक की ओर से राज्य की सेना नगर राज्य के चारों ओर परिक्रमा (गश्त) किया करती थी और यह सम्पूर्ण वर्षा काल में चलने वाली निरंतर प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य दूसरे राज्य द्वारा अपने राज्य की व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कालांतर में जब छोटे राज्य समाप्त हो गए तब इस प्रक्रिया का औचित्य भी समाप्त हो गया। किन्तु ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों ने अपने व अपने पोषक व्यापारियों के हितों की रक्षार्थ धर्म की संज्ञा से सजा कर शिव के जलाभिषेक के नाम पर 'कांवड़िया' प्रथा का सूत्रपात किया जो आज भी अपना तांडव जारी रखे हुये है। अफसोस की बात यह है कि पोंगापंथ का पर्दाफाश करने के बजाए 'नास्तिकवादी' विद्वान भी पोंगापंथ को ही बढ़ावा दे रहे हैं और सच्चाई का विरोध कर रहे हैं।ऐसे ही लोग विविधता और मत- वैभिन्यता का विरोध करते हैं .

 ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, August 20, 2017

कलाकार हर पल ‘मध्यम वर्ग और सत्ता’ के शोषणवादी चक्रव्यूहों को अपनी कला से भेदतें हैं! ------ मंजुल भारद्वाज




 ‘कलाकार’ अपने पेट की बजाए अपने ‘कलात्मक’ आलोक से आलौकित होते हैं !
कलाकारों का अर्थ उपार्जन और जीविका

-    मंजुल भारद्वाज (रंग चिन्तक)

हर प्राणी को ब्रह्माण्ड में जीने के लिए ‘भोजन’ की आवश्यकता अनिवार्य है चाहे वो मिटटी हो , पानी हो ,वनस्पति , मांस या अन्य धातु जिससे शरीर स्वस्थ रहे , पेट भरे और प्राणी जीवित रहे . प्रकृति ने सभी प्राणियों के लिए पर्याप्त संसाधन मुहैया कराये हैं या उपलब्ध हैं . मनुष्य को छोड़ सभी प्राणी अपना भरण पोषण प्रकृति के अनुसार करते हैं या मनुष्य द्वारा स्थापित ‘व्यवस्था’ के अनुसार अपना भरण पोषण करते हैं . हाँ मनुष्य के जीवन यापन के लिए अर्थ सृजन की आवश्यकता होती है . मनुष्य  सभ्य है , सभ्यता का निर्माण किया है, ‘व्यवस्था , सत्ता कायम की है  और हर ‘व्यवस्था’ के  जीवन यापन के सूत्र अलग अलग होते हैं या यूँ कहें कायदे कानून बने हुए है या सरकारें हर समय ‘रोज़गार’ शब्द के सप्तरंगी छतरी के नीचे लोक लुभावन सपने बिखेरती रहती है , हर व्यवस्था , सत्ता के यह प्रशासकीय हथकंडे और सूत्र होते हैं .
मनुष्य जितना ‘सभ्य’ होता जा रहा है उसका ‘पेट’ अन्य प्राणियों के मुकाबले बढ़ता जा रहा है . जो जितना बड़ा , जितना विकसित , जितना आधुनिक , जितना तानाशाह या जितना लोकतान्त्रिक उतना ही उसका ‘पेट’ बड़ा हो जाता है दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र ‘अमेरिका से लेकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ‘भारत’ तक . इसकी वजह ‘पेट’ का आकार नहीं ,अपितु ज़रूरत की बजाए ‘लालच’ को ‘विकास’ मान लेने के भ्रम की है . वैज्ञानिक युग ,विज्ञान के तौर तरीकों और विज्ञान से उपजी ‘तकनीक’ के व्यापारिक , मुनाफाखोरी , ‘खरीदने और बेचने’ के वर्चस्ववादी युग के ढकोसलों की है . सारी धरती प्रकृति की है ..ये ‘विकसित’ मनुष्य को स्वीकार नहीं हैं , “सारी धरती उसकी” ये मन्त्र है इस  ‘विकसित’ मनुष्य का , इसलिए ‘ज़रूरत को अनिवार्य ‘लालच’ का रूप देने के लिए चौबीस घंटे हजारों चैनल पूरे ब्रह्माण्ड में ‘मुनाफ़े’ के लिए पूरे  ‘ब्रह्माण्ड’ के संसाधनों को ‘लूट’ रहे हैं . ऐसे में चंद ‘लोग’ ऐश कर रहे हैं और बाकी अपना पेट भरने के लिए हर पल मारे मारे फिर रहे हैं ..’फिर’ भी मनुष्य अपने आप को ‘शिक्षित और सभ्य” कहता है बड़ी शान से और पूरी प्रकृति उस पर ‘हंसती’ है , खैर ...
आदम काल से लेकर आज के ‘वैज्ञानिक सभ्यता” के दौर तक मनुष्य को जीवन यापन के लिए अपने शारीरिक बल का उपयोग करना पड़ता है .उत्क्रांति के ‘ पैदल ,पहिये और पंख’ के हर उपादानो के दौर में मनुष्य के शारीरिक श्रम का अर्थ उपार्जन में अहम भूमिका है . आदम काल में ‘शारीरिक बल’ ही श्रेष्ट था . जिसका जितना बल उतनी उसकी सम्पत्ति . बुद्धि के विकास ने ‘शारीरिक बल’ को ‘अर्थ’ उपार्जन के  सबसे निचले पायदान पर फेंक दिया . आज जो मनुष्य केवल और केवल ‘शारीरिक श्रम’ से अपनी जीविका चला रहा है वो इस ‘सभ्य और शिक्षित’ समाज के हाशिये पर हैं , जो ‘शारीरिक श्रम’ के साथ थोडा कौशल का उपयोग करते हैं ..वो थोड़ा बेहतर .. जो केवल ‘लैंगिक’ व्यवहार का उपयोग करते हैं वो ‘बेहतर और बदतर’ ..जो  बुद्धि का  उपयोग करते हैं वो ‘समाज’ के उपर वाले तबके में हैं . यानी मनुष्य के इस दौर में अर्थ उपार्जन के चार तरीके हैं 1.शारीरक श्रम एवम् कौशल 2.  भाव भंगिमा और कौशल 3.      लैंगिक व्यवहार 4.    चेतना ,बुद्धि और विचार !
कला और कलाकार का अर्थ उपार्जन कैसे हो? कला ‘चेतना’ है , विद्रोही है , मनुष्य को मनुष्य बनाने और बनाये रखने का माध्यम है . इस दुनिया में कई ‘व्यस्थाएं’ रहीं है जो ‘कला और कलाकार’ को अपने दरबार में अपनी सत्ता के प्रचार प्रसार के लिए उपयोग करती है, आज भी कर रहीं हैं ‘व्यस्थाएं’ इन कलाकारों को भोग और विलासता के सारे संसाधन मुहैया कराती हैं . आजकल ग्रांट , अनुदान इनके लिए उपयुक्त शब्द हैं . चूँकि ‘कला और कलाकार’ विद्रोही होते हैं ..इसलिए सत्ता से उनका संघर्ष होता है , जन सरोकारी होने की वजह से ऐसे ‘कलाकार’ जनता के बीच ‘जनता’ की तरह अपना गुजर बसर करते हैं . और सत्ता के दमन की तरह तरह की यातना सहते हैं ..चाहे हो सरकारी हो या सामजिक हो !
भौतिक विकास , लालच , सत्ता और शोहरत की चकाचौंध ने कलाकारों को सम्भ्रमित किया है . सत्ता ने एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत ‘कला’ को पेट भरने का साधन मात्र बना दिया है . और कलाकारों को एक पेट भरने वाली भीड़ . सत्ता ने ये इसलिए किया है ताकि ‘सत्ता’ जनता का  शोषण करती रहे और उसको ‘सवाल’ पूछने वाले कलाकार , जनता को जागरूक करने वाले कलाकार , कला को चेतना का सर्वोपरी माध्यम मानने वाले कलाकार पैदा ही ना हो ..ऐसा करके सत्ता अपने खिलाफ़ ‘विद्रोह’ को दबाती है . कला और कलाकरों की एक ऐसी भीड़ का निर्माण करती है जो ‘सत्ता’ के टुकड़ों पर बन्दरबांट करते रहे  ! ऐसे समाज का निर्माण करती है सत्ता जहाँ ‘कला और कलाकार’ को मात्र नाचने गाने वाले ‘तुच्छ’ तबके के रूप में देखा जाता है . या उपभोग के ‘भोग्यात्मक’ रूप में . कोढ में खाज पढ़ा लिखा अनपढ़ , शोहरत पिपासु ‘मध्यम वर्ग’ जो हर तरह का सुख भोगना चाहता है किसी भी कीमत पर . आज की शोषणवादी व्यवस्था का ‘वाहक’ है ये ‘‘मध्यम वर्ग’. ‘लालच’ का सिरमौर’ है ये ‘मध्यम वर्ग’. आधी अधूरी ‘सोच’, आधा अधुरा ज्ञान , आधा अधुरा जीवन, और सपने पूरी दुनिया पर कब्जा करने के . इन्हीं रंगीन सपनों को पाने के लिए “विकास’ के अभिशाप महानगरों का निवासी है ये  ‘मध्यम वर्ग’ !
इन महानगरों में अपने सपनों को पाने के लिए हर पल ‘भीड़’ में विशेष होने के अभिनय में माहिर हो गया है ये ‘मध्यम वर्ग’. हर तरह के कृत्रिम बाज़ार का ग्राहक है ये ‘मध्यम वर्ग’. हर तरह की लताड़ सहने में माहिर है ये ‘मध्यम वर्ग’. सबका साथ और सबका विकास का भक्त है ये ‘मध्यम वर्ग’. पर अफ़सोस ये मध्यम वर्ग “थोडा है ..थोड़े की ज़रूरत है” के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ पाता और अपने ही दिखावटी सपनों के जाल में फंसकर ‘शोषित’ होता रहता है और ‘विकास’ का भजन गाता रहता है . इस शोषण चक्र से इस ‘मध्यम वर्ग’ को मुक्ति दिलाता है या दिला सकता है ,वो है ‘कलाकार’! पर ये ‘मध्यम वर्ग’ पूंजीवादी व्यवस्था के षड्यंत्र सूत्र “मनोरंजन के लिए कला’ का भक्त है .इस भक्तिभाव के  ‘तहत’ वो एक ऐसे ‘कलाकारों’ के समूह को प्रोत्साहित करता है जो कला के ‘भोगवादी’ पक्ष के प्रचार प्रसार में माहिर हो . ऐसे कलाकारों को ये ‘मध्यम वर्ग’ अपने एस ऍम एस से चुटकी बजाकर सुपर स्टार बनाता है और शोहरत के आसमान पर बिठाता है . पर ‘कला के चेतनात्मक’ पक्ष का सबसे बड़ा ‘शत्रु’ है ‘मध्यम वर्ग’ !
विकास के महानगरीय ‘विनाश’ टापुओं में “मनोरंजन के लिए कला’ को मानने वाले ‘कलाकारों’ की भीड़ है . जो मध्यम वर्ग के इशारों पर नाचती है और ‘मध्यम वर्ग’ की तरह ही कहीं नहीं पहुँचती . बस घूमती रहती है अपने ही भ्रम जाल में, और शोषण वादी ‘सत्ता’ का राजपाट इसी ‘मध्यम वर्ग’ के भ्रमजाल के ‘पहिये’ पर चलता है .
कलाकार का मकसद केवल पेट भरना नहीं होता . इसका मतलब ये नहीं है की ‘कलाकार’ को जीवन यापन की मौलिक सुविधाओं की दरकार नहीं है . जो ‘कलाकार’ है उसे जीवन यापन की कला भी आती है . और जो रोज़गार की भीड़ में लगा है उसकी बात और है . कलाकार को ‘कला’ का मकसद समझना होगा , विकास के नाम पर ‘विनाशलीला’ के षड्यंत्र को समझना होगा. सत्ता के षड्यंत्र को समझना होगा, उसके अनुदान के टुकड़ों से आगे सोचना होगा  , समाज की ‘चेतना’ की जड़ता को तोडना होगा . कलाकार केवल गाना गाने वाले , नाचने वाले हुनरमंद ‘शरीर’ नहीं होते अपितु ‘चेतना’ से आलौकित जनसरोकारी व्यक्तित्व होते हैं जो हर पल ‘मध्यम वर्ग और सत्ता’ के शोषणवादी चक्रव्यूहों को अपनी कला से भेदतें हैं! क्योकि कला ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है.
आज ‘कलाकारों’ को तय करना है की वो ‘अर्थ’ उपार्जन में अपने आप को कौन सी श्रेणी में रखना चाहते है  1.शारीरक श्रम एवम् कौशल 2.  भाव भंगिमा और कौशल 3.   लैंगिक व्यवहार 4.    चेतना ,बुद्धि और विचार !
आओ मनुष्यता और इंसानियत को बचाने के लिए कला के ‘चेतना’ के विवेकशील प्रतिबद्ध स्वरूप को अपनाएं . कला के इन्सान को इंसान बनाने वाले ‘कलात्मक’ पक्ष को अपनाएं और  सत्ता के अनुदानी टुकड़ों का तिरस्कार कर अपने आप को रोजगार वाली  भीड़ से मुक्त करें . क्योकि ‘कलाकार’ अपने पेट की बजाए अपने ‘कलात्मक’ आलोक से आलौकित होते हैं. कलामेव जयते!


संक्षिप्त परिचय -

“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।
एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 16000 से ज्यादा बार मंच से पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।लेखक-निर्देशक के तौर पर 28 से अधिक नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। फेसिलिटेटर के तौर पर इन्होंने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थियेटर ऑफ रेलेवेंस सिद्धांत के तहत 1000 से अधिक नाट्य कार्यशालाओं का संचालन किया है। वे रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने वाला हथियार मानते हैं। मंजुल मुंबई में रहते हैं। उन्हें 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है।




 ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, August 18, 2017

अनुच्छेद ३७० है 'भारतीय एकता व अक्षुणता' को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.------ विजय राजबली माथुर








Tuesday, July 12, 2016
जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ ------ विजय राजबली माथुर
श्रीनगर - लेह मार्ग पर 'द्रास क्षेत्र' में 'जोजीला' दर्रे के क्षेत्र में स्वर्ण से भी महंगी धातु 'प्लेटिनम' है जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है ही है कश्मीर विवाद की जड़। 
http://krantiswar.blogspot.in/2016/07/blog-post.html

जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ :

वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

जब जिया-उल-हक साहब की उपयोगिता अफगान समस्या के बाद समाप्त हो गई तब यू एस ए ने उनको अपने राजदूत की कीमत पर भी हवाई जहाज समेत उड़ा दिया था। ओसामा-बिन-लादेन के सफाये के साथ ही यू एस ए ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को अमान्य कर दिया है। उसके लिए अब पाकिस्तान उपयोगी नहीं रह गया है विशेषकर तब जब मोदी के नेतृत्व में आर एस एस समर्थक सरकार भारत में गठित हो चुकी है। जब सरकार के माध्यम से भारत को अपने समर्थन में यू एस ए खड़ा देख रहा है तब पाकिस्तान के अस्तित्व का मतलब ही क्या रह जाता है? 

 इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है। 


 इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि  मोदी साहब शास्त्री जी जैसी (1965 ) या इंदिरा जी जैसी (1971 ) दृढ़ता दिखाएंगे। तब तक भारत से नेहरू जी की  व्यावहारिक नीतियों का सफाया नहीं हुआ था और देश का स्वाभिमान कायम था। लेकिन 1975  में हुये देवरस-इन्दिरा 'गुप्त-समझौते' के तहत 1980 में इंदिराजी की पुनर्वापसी से देश में आर एस एस का जो प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ था वह 1991 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के साथ ही मजबूत होता गया तथा 13 दिन, 13 माह और 60 माह की ए बी वाजपेयी सरकारों के दौरान उसने शासन-प्रशासन और इंटेलीजेंस में तगड़ी पकड़ बना ली थी। मनमोहन सिंह जी का 120 माह का कार्यकाल आर एस एस की दोहरी खुशियों का था जिसमें सत्ता व विपक्ष उसके ही इशारे पर चल रहा था। मोदी के सत्तारोहण ( जिसमें मनमोहन सिंह जी का सक्रिय योगदान है ) से सत्ता तो सीधे-सीधे आर एस एस से ही प्रभावित है किन्तु अब विपक्ष को पुनः अपनी पकड़ में लाने हेतु आर एस एस तमाम तिकड़में एक साथ चल रहा है। आ आ पा के रूप में उसे एक नया राजनीतिक दल तो मिल ही चुका है पुराने क्षेत्रीय दलों जैसे सपा, बसपा आदि-आदि को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करके आर एस एस राजनीति में व्यापक रूप से अपने पैर पसार रहा है। भारत में सर्वहारा (दलित ) वर्ग को व्हाईट हाउस की नीतियों के तहत मोदी के पीछे गुप-चुप ढंग से लामबंद किया जा रहा है। 

'भारतीय एकता व अक्षुणता ' को बनाये रखने की गारंटी  :

तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद इंदिरा जी की इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने अपार राष्ट्र-भक्ति के कारण कनाडाई,जर्मन या किसी भी विदेशी कं. को वह मलवा देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसमें 'प्लेटिनम'की प्रचुरता है.सभी जानते हैं कि प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने अनुच्छेद  '३७०' न रखवाया  होता  तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चुका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते.अनुच्छेद ३७० को हटाने का आन्दोलन चलाने वाले भी छः वर्ष सत्ता में रह लिए परन्तु इतना बड़ा देश-द्रोह करने का साहस नहीं कर सके,क्योंकि उनके समर्थक दल सरकार गिरा देते,फिर नेशनल कान्फरेन्स भी उनके साथ थी जिसके नेता शेख अब्दुल्ला साहब ने ही तो महाराजा हरी सिंह के खड़यंत्र  का भंडाफोड़ करके कश्मीर को भारत में मिलाने पर मजबूर किया था .तो समझिये जनाब कि अनुच्छेद  ३७० है 'भारतीय एकता व अक्षुणता' को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.और यही वजह है कश्मीर समस्या की .साम्राज्यवादी शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपने इस खनिज भण्डार का खुद प्रयोग कर सके इसी लिए पाकिस्तान के माध्यम से विवाद खड़ा कराया गया है.इसी लिए इसी क्षेत्र में चीन की भी दिलचस्पी है.इसी लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर.एस.एस.उनके स्वर को मुखरित करने हेतु 'अनुच्छेद  ३७०' हटाने का राग अलापता रहता है.इस राग को साम्प्रदायिक रंगत में पेश किया जाता है.साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है.यह हमारे देश की जनता का परम -पुनीत कर्तव्य है कि, वह सरकार की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखे कि वह यू एस ए के मंसूबे न पूरे कर दे। 


अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है तो क्या विपक्ष भी नहीं करेगा ? और जनता से तादात्म्य स्थापित करने का कोई प्रयास साम्राज्यवाद विरोधी खेमे की ओर से भी अभी तो नहीं हो रहा है अभी तो वही पुरानी लीक ही पीटी जा रही है जिसका इस देश कि जनता पर कभी भी कोई भी असर हो ही नहीं सकता है।


अफसोसनाक बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी साम्यवाद/वामपंथ के हिमायती यू एस ए व आर एस एस के इस अभियान का कोई विकल्प न प्रस्तुत करके उनकी चालों का शिकार होते जा रहे हैं और अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाते जा रहे हैं। पोंगापंथ, ढोंगवाद/ब्रहमनवाद तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है और प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता के नाम पर जिस तरीके से उसका विरोध किया जाता है उससे उसे अत्यधिक मजबूती ही मिलती जाती है। आज जब जनता को वास्तविक धर्म का मर्म समझाये जाने कि ज़रूरत थी तब माकपा महासचिव उसी पोंगापंथ के पथ का अनुसरण करके अंततः अपने विरोधियों को ही शक्तिशाली बनाने का कार्य शुरू कर चुके हैं। आज शासन में  तो अब संभव ही नहीं  है  अतः विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता है जो जनता का दिल जीत कर किसान,जवान और मजदूर के हितों का संघर्ष चला कर नेतृत्व कर सके। 






 ~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, August 15, 2017

श्री कृष्ण और स्वाधीन भारत : ज्योतिषीय समरूपता ------ विजय राजबली माथुर






 जबकि श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद की अष्टमी की अर्द्ध रात्रि मे होने के कारण रात्रिकालीन अष्टमी को मनाना चाहिए परंतु पोंगा-पंथ जैसे कहेगा वे वैसा ही मानेंगे,  वे सदियों से ऐसा ही करते आ रहे है-राम और कृष्ण के जन्म दिन धूम-धाम से मनाते हैं फिर उनके आदर्शों के विपरीत आचरण करते और अपनी दिनचर्या चलाते हैं। लेकिन राम और कृष्ण के नाम पर मार-काट करने को सदैव तैयार रहते है,उन्हें यही धर्म सिखाया गया है। 

वस्तुतः आवश्यकता है राम और कृष्ण के आदर्शों को अपने चरित्र मे उतारने की उन्हें हृदयंगम करने की,परंतु वह कोई नहीं करेगा। और क्यों नहीं करेगा?क्योंकि वे भगवान का अवतार थे हम मनुष्य हैं इसलिए नहीं कर सकते ,यह दलील पेश की जाती है। भगवान की परिभाषा क्या है कोई समझना ही नहीं चाहता है।यथा : 
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
भगवान =भ (भूमि-ज़मीन  )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। 

इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं। 


प्रत्येक मनुष्य जीवन मे उत्तरोत्तर सुख की कामना करता है और कोई भी प्राणि स्वतः दुख नहीं उठाना चाहता,परंतु फिर भी संसार मे दुख है और यह सर्वव्यापक है। यदि यह आपको मालूम हो जाये कि आपके जीवन मे कितना दुख है और कब तक है तो आप उसका निराकरण करके सुख की प्राप्ति कर सकते हैं। राम और कृष्ण ने ऐसा ही किया था तो उन्हें दुख -दुख लगा ही नहीं। 
श्री कृष्ण :
प्रतिवर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी को भारत तथा अन्यत्र भी धूम-धाम से मनाने वाले लोग यदि बुद्धि-विवेक का प्रयोग करते हुये ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो श्री कृष्ण के चतुर्थ भाव पर 'मंगल'अपनी दशम दृष्टि डाल रहा है जिस कारण उन्हें जन्मते ही माता देवकी के सुख से वंचित होना पड़ा। बचपन से ही गोकुल मे कठोर श्रम करना पड़ा। लेकिन इसी मंगल के प्रभाव से उन्होने पिता वासुदेव व पिता कुल का नाम रोशन किया कंस,शिशुपाल आदि का संहार कर जनता को त्रास से मुक्ति दिलाकर। 

ज्योतिष के ग्रन्थों मे बताया गया है कि यदि 'मंगल' चतुर्थ भाव को देख रहा हो तो यह शुभ नहीं रहता,भाग्य साथ नहीं देता ,कठोर श्रम करना पड़ता है,बचपन मे ही मातृ सुख से वंचित रहना पड़ता है। 

इस सबके बावजूद जातक अपने पिता और अपने कुल का नाम रोशन करता है तथा समाज को ऊंचा उठाता है। 

 श्री कृष्ण के साथ बिलकुल ऐसा ही तो हुआ। 

ज्योतिष के ही अनुसार यदि चतुर्थ भाव पर 'चंद्र' की दृष्टि हो तो जातक सौम्य ,सरल एवं उन्नत्त विचारों का होता है  उसका घरेलू जीवन सुखद और सानन्द व्यतीत होता है। यदि चंद्रमा के साथ गुरु भी हो तो जातक के गजेटेड अधिकारी बनने के योग रहते हैं। यदि 'मंगल' एवं 'चंद्र' दोनों एक साथ चतुर्थ भाव को देखते हो  तो जातक को जीवन मे किसी भी प्रकार धन का आभाव नहीं रहता है। 

श्री कृष्ण की जन्म कुंडली मे 'चंद्रमा' अपनी चतुर्थ दृष्टि से उनके चतुर्थ भाव को देख रहा है है जिस कारण श्री कृष्ण का स्वभाव सौम्य,सरल व उन्नत्त विचारों वाला रहा। उनका घरेलू जीवन सुखी व सानन्द रहा। पत्नी रुक्मणी उनकी सहायिका रहीं तो पुत्र प्रद्युम्न तो उनकी छाया कृति ही कहे जा सकते हैं। 

'मंगल' और 'चंद्र' दोनों ही ग्रहों का श्री कृष्ण की कुंडली के चतुर्थ भाव को देखने का ही परिणाम था कि श्री कृष्ण सर्व ऐश्वर्य सम्पन्न द्वारिकापुरी की स्थापना कर सके। 

स्वाधीन भारत :

15 अगस्त 2017 को हम अपनी स्वाधीनता की 71 वी वर्षगांठ मना रहे हैं  ।  आजादी के 70 वर्षों बाद भी हमारा देश समृद्ध नहीं हो सका तो इसका कारण है कि हमारे देश की स्वाधीनता की कुंडली के चतुर्थ भाव पर 'मंगल' की तृतीय दृष्टि  जिसने आजादी की शैशवावस्था मे ही आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र मे देश को रुग्ण बना दिया। साथ ही चतुर्थ भाव पर 'केतू' की भी दशम दृष्टि पड़ रही है पुनः यह आजादी की शैशवावस्था मे  रुग्णता को ही बढ़ा रही है।पडौसी राष्ट्रों का असहयोग तथा राष्ट्र को बाधाओं का सामना भी चतुर्थ भाव पर इसी केतू की दृष्टि का परिणाम रहा। 

इसी केतू की दृष्टि का प्रभाव है कि आज भी हमारा देश ऋण जाल मे फंसा हुआ है । भारत के मित्र समझे जाने वाले राष्ट्र भी इसका हित सम्पादन नहीं करते हैं। 'केतू' की चतुर्थ भाव पर  दृष्टि का ही परिणाम है कि भारत के मस्तक भाग 'कश्मीर' पर गहरी चोट पड़ी है। और वह आज भी समस्याग्रस्त है। 

ज्योतिष के अनुसार कुंडली के चतुर्थ भाव को  केतू देख रहा हो तो वह बचपन से ही बीमार रहता है। स्वभाव मे झल्लाहट व चिड़चिड़ापन रहता है,बाधाओं का सामना करना पड़ता है। धन की चिंता मे कठोर श्रम करना पड़ता है। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि कुंडली का चतुर्थ भाव  जो सुख भाव है न केवल सामान्य मनुष्य वरन योगीराज 'श्री कृष्ण' तथा  ‘स्वाधीन भारत’ राष्ट्र पर भी ग्रहों का भरपूर प्रभाव पड़ा है। देश की प्रगति व विकास हेतु और स्वाधीन भारत की कुंडली के आधार पर ‘मंगल’ व ‘केतू’ ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचाव के वैज्ञानिक (पोंगापंथ के अनुसार नहीं) उपाए हमारे शासकों को करने ही पड़ेंगे तभी हम अपने देश को ऋण जाल से मुक्त कराने तथा ‘कश्मीर’ समस्या का समाधान कराने मे सफल हो सकेंगे अन्यथा जो जैसे चल रहा है,चलता ही रहेगा। ग्रहों का प्रभाव अमिट है और उनकी शांति ही एकमात्र उपाय है।






हमारा देश पहले सोने की चिड़िया कहलाता था। तब भी इसका भूगोल वास्तु दोष पर आधारित था। किन्तु हमारे देशवासी वैज्ञानिक वेदिक मतानुसार हवन पद्धति जो पूर्ण रूप से मेटेरियल साईंस पर अवलंबित है का अनुपालन करते थे। आज पौराणिकों (जिन्हें विदेशी शासकों के हितार्थ ढाला गया) के बहकावे मे इस वेदिक पद्धति का परित्याग कर दिया गया है और परिणाम सबके सामने हैं। अन्ना का ढ़ोल-तमाशा उसी कहानी का हिस्सा था  जिससे वर्तमान सरकार सत्तारूढ़ हो सकी है। 


 ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, August 14, 2017

श्री कृष्ण और साम्यवाद ------ विजय राजबली माथुर

 
फोटो सौजन्य से डॉ सुजाता चौधरी 


 श्री कृष्ण का साम्यवाद विभेद नहीं करता । यह सभी को समान दृष्टि से देखता है। --- बृजेश शुक्ल 


Thursday, August 9, 2012
श्री कृष्ण -साम्यवाद और वेद विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_9.html
ज़िला मंत्री-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,लखनऊ ने काउंसिल की एक बैठक मे श्री कृष्ण के बचपन की उस घटना का उल्लेख करते हुये कार्यकर्ताओं का आह्वान किया था कि हमे उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष पथ  पर बढ़ना चाहिए। कामरेड  जिलमंत्री ने स्पष्ट किया कि उस समय गावों का शहरों द्वारा शोषण चरम पर था और बालक श्री कृष्ण को यह गवारा न हुआ अतः उन्होने शहरों की ओर 'मक्खन' ले जाती ग्वालनों की मटकियाँ फोड़ने का कार्यक्रम अपने बाल साथियों के साथ चलाया था। 

योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।

तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-
"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-
"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 

इन सबके आधार मंत्र हैं-

1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)
2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)


पहले के विदेशी शासकों ने हमारे महान नेताओं -राम,कृष्ण आदि को बदनाम करने हेतु तमाम मनगढ़ंत कहानियाँ यहीं के चाटुकार विद्वानों को सत्ता-सुख देकर लिखवाई जो 'पुराणों' के रूप मे आज तक पूजी जा रही हैं। बाद के अंग्रेज़ शासकों ने तो हमारे इतिहास को ही तोड़-मरोड़ दिया। यूरोपीय इतिहासकारों ने लिख दिया आर्य एक जाति-नस्ल थी जो मध्य यूरोप से भारत एक आक्रांता के रूप मे आई थी जिसने यहाँ के मूल निवासियों को गुलाम बनाया। इसी झूठ को ब्रह्म वाक्य मानते हुये 'मूल निवासियों भारत को आज़ाद करो' आंदोलन चला कर भारत को छिन्न-भिन्न करने का कुत्सित प्रयास चल रहा है। अंग्रेजों ने लिख दिया कि 'वेद गड़रियों के गीत हैं' और साम्राज्यवाद विरोधी होने का दंभ भरने वाले पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा सरीखे उद्भट विद्वान उसी आधार पर वेदों को अवैज्ञानिक बताते नहीं थकते हैं।

जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए और यहाँ 30 वर्षों तक रह कर 'संस्कृत' सीख कर वेदों को समझा एवं मूल पांडु लिपियाँ एकत्र कर चलते बने। जर्मन मे उनके अनुवाद किए गए फिर अङ्ग्रेज़ी आदि दूसरी भाषाओं मे जर्मन भाषा से अनुवाद हुये। हिटलर ने खुद को आर्य घोषित करते हुये दूसरों के प्रति नफरत फैलाई जो कि आर्यत्व के विपरीत है। 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।

'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 


दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।  
~विजय राजबली माथुर ©

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Sunday, August 13, 2017

वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है ------ विजय राजबली माथुर

 वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। 














 


विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों ,उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। 

' ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् ' यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने.अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था.(अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है).श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था.लेकिन कालांतर में पोंगा-पंडितों ने अपने निजी स्वार्थ में इस रक्षा-सूत्र-बंधन  अर्थात जनेऊ धारण करने के पावन-पर्व को राखी बांधने-बँधवाने तथा बहन-भाई के बीच सीमित कर दिया .
 उपनयन अर्थात जनेऊ के लाभों से साधारण जनता को छल पूर्वक वंचित कर दिया गया है.
 उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा.
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा.
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष -गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था.आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं?
विश्वास-सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य 
अविश्वास-सत्य को स्वीकार न  करना 
 अंध-विश्वास--विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना 
विज्ञान-किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं.
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं.वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं.यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं.परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता,परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर)क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है.इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते.यही समस्या है.

लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका  विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए। 



वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल, लिंग - भेद से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -

'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।


'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =


हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।


'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=


हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। ।


'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=


सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान ।
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों कोई  न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। ।
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।   


ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही  वस्तुतः साम्यवाद का  भी मूलाधार  है ।


~विजय राजबली माथुर ©

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Wednesday, August 9, 2017

होपग्रांट के सैनिक साधू -फकीर वेश धरण कर क्रांति कुचल सके ------ कृष्ण प्रताप सिंह








 ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, August 2, 2017

नीतीश को दोबारा चुनाव लड़ कर लालू परिवार को मिटाने के लिए जनादेश लेना चाहिए ------ अनिल सिन्हा / नवेंदु कुमार

  भ्रष्टाचार के नाम पर लोकतंत्र से खिलवाड़ को रोकिए।नीतीश ने सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ वोट मांगा था। अब उन्हें दोबारा चुनाव लड़ कर लालू परिवार को मिटाने के लिए जनादेश लेना चाहिए। बिहार की बीमारी से लड़ने की जिम्मेदारी कोई और लेगा। यह नीतीश जी के वश का नहीं है।



Navendu Kumar
लालू परिवार को मिटाने का ही जनादेश तो ले लीजिए आदरणीय नरेन्द्र-नीतीश जी!
भ्रष्टाचार के साथ हो रहे और किये जा रहे भ्रष्टाचार को कौन रोकेगा? इस भ्रष्टाचार का क्या होगा मित्रों? ये किसी नीतीश कुमार के वश का नहीं। उनके नये सहयोगी कोई 'अपराजेय' नरेन्द्र मोदी के बूते का भी ये नहीं। क्योंकि देश ने बीते तीन सालों में देख लिया है। देख लिया है उन्हीं के अध्यक्ष की निजी संपत्ति में 300 प्रतिशत का इज़ाफ़ा होते हुए। देख लिया है लोकतांत्रिक तौर-तरीकों की सरेआम हत्या होते हुए। छोड़ भी दीजिये, बिहार की बीमारी से लड़ने का काम कोई और कर लेगा! मेरे दोस्त और वरिष्ठ पत्रकार  Anil Sinha  ने अपने लेख में उठाये हैं ऐसे ही कुछ बेहद ज़रूरी और मौजूं सवाल। आप भी पढिये~

।।भ्रष्टाचार बनाम लोकतंत्र।।
अब यह जरूरी हो गया है कि भारतीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के हथियार की सखोल चर्चा की जाए। (पुणे में हूं और ‘व्यापक’ के बदले इस मराठी शब्द 'सखोल' को अभी ज्यादा सटीक पाता हूुं)। मुझे लगता है कि किसी लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को भारतीय दंड संहिता के कुछ प्रावधानों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता है। भ्रष्टाचार का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि किसी ने बेनामी संपत्ति खरीदी और सत्ता का इस्तेमाल अपनी आमदनी बढाने के लिए किया। लोकतंत्र के खिलाफ आपका कोई भी कदम भ्रष्ट है और अक्षम्य है। चुनाव में करोड़ों खर्च करने से लेकर हजारों का लिबास पहनना भी भ्रष्टाचार है। हमारा दिमाग इतना भ्रष्ट हो चुका है कि हम ने इस तरह के सवाल करना छोड़ दिया है। जवाहर लाल नेहरू से यह सवाल डा लोहिया ने पूछा था। लेकिन इसके लिए डा लोहिया जैसी सादगी चाहिए। 
देश की जनता के पैसे से खड़ी कंपनियों को व्यापारियों के हाथ बेचना भ्रष्टाचार है। बैंकों में जमा देशवासियों की मेहनत का पैसा डकारने का मौका उद्योगपतियों को देना भ्रष्टाचार है। जमीन, पानी, जंगल बड़ी कंपनियों को मुफ्त में देना भ्रष्टाचार है। देश का हजारों करोड़ खर्चने के बाद भी नौजवानों को रोजगार नहीं देना अपराध है। शिक्षा को व्यापार बनाना अपराध है। चिकित्सा को मुनाफाखोरी का साधन बनाना संगीन जुर्म है। गोरक्षा के नाम पर हो रही हत्याओं पर खामोश रहना भ्रष्टाचार है। किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए पैसा खर्च करने में आनाकानी करने वाली सरकार भ्रष्ट है। 
पार्टियों ने इन भ्रष्टाचारों के खिलाफ लड़ना बंद कर दिया है, इसलिए छोटे अपराधों, वह भी सिर्फ विरोधी नेताओं के अपराधों, के खिलाफ लड़ाई को ही वे बढा-चढा कर पेश करती हैं। नीतीश जी लालू परिवार के भ्रष्टाचार के खिलाफ तो कमर कस कर उतर जाते हैं, लेकिन अपने इतने लंबे कार्यकाल मेे भी किसी जनविरोधी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते दिखाई नहीं देते हैं। जमींदारों और जातिवादी नेताओं के सहारे राजनीति चलाने से वे परहेज नहीं करते। ये तो बता दीजिए कि यह क्या भ्रष्टाचार नहीं है? 
बिहार के लोग राज्य में रोजगार नहीं पाते हैं। सुशासन राज में भी नहीं पाये और देश के हर कोने में गालियां खाकर अपना जीवन चलाते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री का इसके लिए कुछ नहीं करना भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? 
अपना मन इतना छोटा नहीं करें कि लालू के बदले नीतीश और नीतीश के बदले लालू ही ढूंढें। हम जनता हैं। हमारे पास विकल्प ही विकल्प हैं। मन की गांठ खोलिए, भ्रष्टाचार के नाम पर लोकतंत्र से खिलवाड़ को रोकिए।

नीतीश ने सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ वोट मांगा था। अब उन्हें दोबारा चुनाव लड़ कर लालू परिवार को मिटाने के लिए जनादेश लेना चाहिए। बिहार की बीमारी से लड़ने की जिम्मेदारी कोई और लेगा। यह नीतीश जी के वश का नहीं है।

साभार : 
https://www.facebook.com/navendu.kumarsinha/posts/1180141798758493





~विजय राजबली माथुर ©

Friday, July 28, 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन के 25 वर्ष






थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन के 25 वर्ष
10,11,12 अगस्त, 2017 को
"दिल्ली में 3 दिवसीय नाट्य उत्सव”

काल को चिंतन से गढ़ा और रचा जाता है.चिंतन आपके भीतर से सृजित होकर वैश्विक क्षितिज को पार कर विश्व में जीता है.कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. कलात्मक चिन्तन ही मनुष्य के विष को पीने की क्षमता रखता है.1990 के बाद का समय दुनिया के लिए ‘अर्थहीन’ होने का दौर है.ये एकाधिकार और वर्चस्ववाद का दौर है.विज्ञान के सिद्धांतों का तकनीक तक सीमित होने का दौर है. आज खरीदने और बेचने का दौर है. मीडिया का जनता की बजाए सत्ता की वफ़ादारी का दौर है.ऐसे समय में ‘जनता’ को अपने मुद्दों के लिए ‘चिंतन’ और सरोकारों के एक मंच की जरूरत है. ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्धांत 12 अगस्त,1992 से जनता के सरोकारों का ‘चिंतन मंच’ बनकर कर उभरा है और आज अपने ‘रंग दर्शन’ के होने के 25 वर्ष पूर्ण कर रहा हैं. इन 25 वर्षों में ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने गली, चौराहों, गावों, आदिवासियों, कस्बों और महानगरों से होते हुए अपनी वैश्विक उड़ान भरी है और वैश्विक स्वीकार्यता हासिल की है.
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सिद्धांत
1. ऐसा रंगकर्म जिसकी सृजनशीलता विश्व को मानवीय और बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो ।
2. कला , कला के लिए ना होकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे । लोगों के जीवन का हिस्सा बने ।
3. जो मानवीय जरूरतों को पूरा करे और अपने आप को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में उपलब्ध कराये ।
4. जो अपने आप को बदलाव के माध्यम के रूप में ढूंढे । अपने आप को खोजे और रचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाये ।
5. ऐसा रंगकर्म जो मनोरंजन की सीमाएँ तोड़कर जीवन जीने का ज़रिया या पद्धति बने ।
(“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन भारत और वैश्विक स्तर पर हो रहा है।)

आज विकास या विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश के दौर में मनुष्य का मनुष्य बने रहना एक चुनौती है. नाटक “गर्भ”, “अनहद नाद – Unheard Sounds of universe” और “न्याय के भंवर में भंवरी” के माध्यम से आपको अपने अंदर के इंसान की आवाज़ सुनाने के लिए देश की सत्ता के केंद्र “दिल्ली” में 10,11 और 12 अगस्त 2017 को 3 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस - नाट्य उत्सव’ का आयोजन हो रहा है. आपकी सार्थक और रचनात्मक सहभागिता की अपेक्षा. क्योंकि ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्दांत के अनुसार ‘दर्शक’ पहला और सशक्त ‘रंगकर्मी’ है ! 

मंजुल भारद्वाज लिखित एवम् निर्देशित और अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर,कोमल खामकर,तुषार म्हस्के अभिनीत प्रसिद्ध नाटक “गर्भ” और “अनहद नाद –अनहर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स” का मंचन  क्रमशः 10 और 11 अगस्त, 2017 को शाम 6.30 बजे “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” (गोल मार्किट , भाई वीर सिंह मार्ग नई दिल्ली -1) में होगा !

जबकि 12 अगस्त को सुबह 11.00 बजे, मंजुल भारद्वाज लिखित और निर्देशित, जानी मानी रंग अभिनेत्री बबली रावत अभिनीत नए नाटक “न्याय के भंवर में भंवरी” का प्रीमियर  म ल भारतीय ऑडिटोरियम (लोधी एस्टेट , लोधी रोड, नई दिल्ली – 3) में होगा !






 ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, July 20, 2017

क्या पैसा कमाना ही सब कुछ है? ------ केशव

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Thu, Jul 20, 2017 at 8:21 PM




कला से क्रांति की कार्यशाला- थियेटर ऑफ़ रेलेवंस (TOR) की रंगशाला
-    केशव

क्रांति क्रांति क्रांति... समाजिक क्रांतिआर्थिक क्रांतिराजनीतिक क्रांति... कहाँ कहाँ नहीं भटका मैं इस क्रांति के तलाश में! अमेरिकी क्रांतिफ़्रांसिसी क्रांतिरसियन क्रांति... सबको पढ़ा सबको समझा!यहाँ तक कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम और दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद के खिलाफ आन्दोलनजिन्हें मैं महान क्रांतियों में गिनता हूँ सबको जाना पर एक दर्द हमेशा मेरे मन को आंदोलित करती रहा  कि इन क्रांतियों ने सत्ता को तो बदला मगर क्या ये क्रांतियाँ अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सकींन सब क्रांतियों ने सत्ता को हिला दियाउसे बदल दियापर क्या ये क्रांतियाँ अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुँच पायीं??? 
अंतिम लक्ष्य: मानव द्वारा मानव के शोषण को ख़त्म करनामानवीय सम्वेदनाओं को जगानामानवों के बीच समानता को लाना! क्या ये लक्ष्य हमें प्राप्त हुआ??? नहीं!!! हमने सत्ता को बदला तो शोषण ने भी अपने स्वरुप को बदला राजतंत्र से तानाशाहीउपनिवेशवादफिर आज का लोकतंत्र! क्या ये लोकतंत्र समाज में समानता को स्थापित कर सकामेरा जबाब है: नहीं! सत्ता तो बदली मगर जो लोग हाशिए पर थेवो आज भी हाशिए पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैंउनके जीवन में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है। और मैं हमेशा से उनके लिए लड़ने की चाह के साथ जीता आया हूँ,इन तमाम क्रांतियों को पढ़ने समझने के बाद मेरे समझ में यही आया कि सिर्फ़ उनके लिए लड़नेउनको न्याय दिलाने की कोशिश करने से कुछ नहीं होगाहमें उनको अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाने की जरूरत है ना कि उनके लिए लड़ने की। आज लोगों को एक राजनीतिक या सामाजिक क्रांति के बजाए एक सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत हैजो उन्हें अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाए। अब ये मुझे अपने अकेले के बस कि बात नहीं लगी कि मैं लोगों को उनके हक़ के लिए लड़ना सिखा सकूँ तो मैं अनेक खुद को क्रांतिकारी कहने वाले संगठनों से जुड़ता चला गया मगर कहीं भी मुझे वो बात नजर नहीं आई जो समाज में व्याप्त उन कुरीतियों को बदल सके जो इन शोषणों का कारण बनती हैंइसलिए मेरा जीवन उन लोगों की खोज में तब्दील हो गया जो इन  कुरीतियों को चुनौती दे रहे हों। अपने इसी खोज में भटकते हुए मैं पहुँच गया थियेटर ऑफ़ रेलेवंस की रंगशाला में!
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के संस्थापक श्री मंजुल भारद्वाजजिनसे मेरी पहली मुलाकात यूथ फ़ॉर स्वराज की कार्यशाला में में हुई थीजिनसे मैं प्रभावित हुआ थाजिनसे मैंने अपने मन की बात कही थी कि मैं एक लेखक बनना चाहता हूँ! हाँ मैं एक एक लेखक बनना  चाहता हूँ! एक ऐसा लेखक जो समाज में व्याप्त कुरीतियों से लड़ेसमाज को एक नया मार्ग प्रशस्थ करे! उन्होने  मुझे  समझामुझे अपनी रंगशाला में बुलाया! मैं वहाँ गया और वहाँ के अनुभव ने मुझे एक नयी दिशा प्रदान किया! वहाँ थी अश्विनी जिसने अपनी सास को मंगलसूत्र को पहनने और पहनाने वाली रूढ़िवादी सोच से रूबरू करायाक्योंकि ये हमारे समाज में महिलाओं की मानसिक गुलामी का प्रतीक हैवहां थी कोमल जो खुद इस पितृसत्तात्मक समाज से लड़ीअपनी छोटी बहन को इसके खिलाफ लड़ना सिखाया। उसकी बहन स्कूल से वापस आ रही थीरास्ते में एक 'मर्दउसके सामने आया और अपनी पैंट की ज़िप खोल कर खड़ा हो गया। वो डर गईघर आकर उसने अपने अपनी माँ को ये बात बताई तो उनका कहना था कि "तू उसके सामने गई ही क्यों थी?" कितने आसानी से हम ये अवधारणा बना लेते हैं ना कि अगर छेड़छाड़ या बलात्कार की घटना घटी है तो इसमें दोष लड़की का हैवही छोटे कपड़े पहन कर,श्रृंगार कर के मर्दों को इस दुष्कृत्य के लिए आमंत्रण देती है! मगर कोमल ने अपनी बहन का साथ दियाउसे लड़ना सिखायाउसने उससे बोला कि अब जब वो मर्द दिखे तो  उससे लड़ जाना और उसकी बहन ने ऐसा ही किया। कहने का तात्पर्य ये है कि हम क्रांति की खोज में भटकते युवाक्या सच में क्रांति के वाहक हैं?? वो कहते हैं ना कि क्रांति की असली लड़ाई अपने घर से ही शुरू होती हैतो क्या हमने वो लड़ाई लड़ी हैशायद नहीं हम इस लड़ाई को अपने घर में शुरू नहीं कर पाए हैं और यही कारण है हमारी असफलता का ! यहां मैं अपनी व्यक्तिगत बात कर रहा हूँहो सकता है आपने लड़ी हो मगर मैं कहीं इस लड़ाई में कमजोर पड़ जाता रहा हूँ।
दरअसल हमें बचपन से शिक्षा दी गयी श्रवण कुमार की जो अपना जीवन छोड़ अपने अंधे माता पिता को ढोता रहा, 'तीर्थ-दर्शनके लिए! मोरध्वज की जिसने अपने विश्वास के लिए अपने पुत्र को आरीसे ची दिया। हमें एक जातिवादी गुरु की महानता के बारे में पढ़ाया जाता है जिसने अपने शिष्य का अंगूठा काट लिया। दरसअल होश संभालने के साथ ही हमें रोबोट बना दिया जाता हैहमें लगता है कि हम जो कर रहे हैं वो अपनी मर्जी से कर रहे हैं मगर वास्तविकता में हमें कोई और कंट्रोल कर रहा होता है।
हमें 'अश्विनीने अपने कश्मीर के अनुभव के बारे में बतायालेह-लद्दाख़ से भी लगभग ढाई सौ किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान की सीमा पर एक गाँव है जहां वो गयी थीं। उन्होंने बताया कि शत प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले उस गाँव में उन्हें कभी भी असुरक्षित  महसूस नहीं हुआ। वहाँ पर उन्होंने देखा कि हर घर में लोगों ने नीचे गड्ढा खोद कर पत्थरों से एक बंकर (तहखाना) बना रखा  है। जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो लोगों ने बताया कि युद्ध के दौरान यहाँ उनके सर के ऊपर से बम गुजरता है और कब वो बम किसके सर पर गिर जाए इसका कोई भरोसा नहीं रहता। इससे बचने के लिए उन्होंने ये बंकर (तहखाना) बना रखा है। भारत के भीतरी हिस्से में रहकर जो लोग युद्ध का समर्थन करते हैंउनसे मैं कहना चाहता हूँ एक बार वहाँ जाएंउनके जीवन को देखें फिर शायद उन्हें युद्ध की विभीषिका का पता चलेगा। यहां अपने घर पर बैठ कर युद्ध की बात करना बहुत आसान है मगर उस माहौल में जीना उतना ही मुश्किल।
तो मैं जब इस रंगशाला जो कि शांतिवनपनवेलमुम्बई में 10-14 जुलाई ,2017 तक आयोजित थी में पहुंचा तो मुझे एक अलग अहसास हुआ। शहर की आपाधापी से दूर शांतिवनप्रकृति की गोद में चारों ओर से जंगलपहाड़नदी से घिरा ये स्थल पहली ही नज़र में मन को मोह लेता है। प्रकृति की सुंदरता से हमें रूबरू कराता है। रात्रि भोजन के लिए हम भोजन गृह की तरफ जा रहे थेरास्ते में हमें जंगल में चमकते जुगनू नज़र आये और मुझे यकायक ही एक घटना याद आ गयी। लगभग एक महीने पहले की ही बात हैमैं अपने दोस्तों के साथ यमुना एक्सप्रेस वे पर आगरा से दिल्ली लौट रहा थातो नोयडा से पहले एक ओवर ब्रिज आता है जिसके आसपास कई बहुमंजिला इमारतें हैंवहाँ की लाइटिंग काफी शानदार हैंउसे देखकर मेरे दोस्त कहने लगे कि 'वाह! क्या शानदार लाइटिंग है,कितना मनमोहक दृश्य है!मैं इन जुगनुओं को देखने के बाद सोचने लगा कि वास्तव में कौन सा दृश्य मनमोहक हैकंक्रीट की दीवारों में चमकते बल्ब या प्राकृतिक जंगल में चमकते ये जुगनू! जबाब भी मेरे सामने थाइस प्राकृतिक दृश्य का मुकाबला कोई भी मानवीय आविष्कार नहीं कर सकता। 
  इस रंगशाला में हमने श्री मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित दो नाटकों पर कार्य कियापहला नाटक था 'गर्भ'!
'गर्भएक अजन्मे बच्चे की कहानीजो दुनियां की बुराईयों से डरा हुआ है और अपनी माँ के गर्भ में ही सुरक्षित महसूस करता है। वो डरता है जन्म लेने से क्योंकि इस धरती पर जन्म लेने के बाद उसकी मौलिकता को छीन लिया जाता हैउसे एक धर्मजातिभाषा देकर उसके बाल्यकाल के भोलेपन को ख़त्म कर दिया जाता है। गर्भ में आनाजन्म लेनाये प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति के खुद के हाथ में नहीं होता हैइसमें उसकी खुद की मर्जी नहीं होती मगर जन्म लेने के बाद भी उसे अपनी मर्जी से कब जीने दिया जाता हैधर्मभाषाराष्ट्रीयता में उलझा कर उसकी एक व्यक्तिगत पहचान बना दी जाती है और फिर जीवन भर वो व्यक्ति उस पहचान को न चाहते भी ढोता रहता है। इतना ही नहीं फिर उसे दूसरे धर्मजाति भाषा को मानने वाले लोगों से नफरत करना सिखाया जाता है। और फिर इस प्रक्रिया से गुजरने के दौरान इंसान इक हृदयविहीन रोबोट बन कर रह जाता जिसे दूसरों के सुख दुःख से कोई मतलब नहीं होता। उसका जीवन सिर्फ अपने स्वार्थों की पूर्ति करने के प्रयास में खपने लगता है। पर इसमें भी हर मनुष्य कहाँ सफ़ल हो पाता हैजो ताकतवर होता है वो कमजोरों के हक़ को छीन लेता है और जाने कितनी ही जिंदगियां इस हक़ की लड़ाई में ख़त्म हो जाती हैं। समाज मेंव्याप्त  इस होड़ को देखने के बाद गर्भ में बैठा बच्चा सोच रहा है कि क्या मैं इतना ताकतवर हूँक्या मेरे हाथपैर में इतना दम है कि मैं जन्म लेकर दुनिया की अंधी दौड़ में शामिल हो पाउँगाउसे जीत पाउँगाइस से तो बेहतर यही है कि मैं सुरक्षित अपनी माँ के गर्भ में ही बैठा रहूँ।

  दरअसल अपने जीवन में भी हम अपने आस पास एक गर्भ बना लेते हैंजिसके बाहर की दुनियां से हमें कोई मतलब नहीं होता। आज चलती ट्रेनबसलोगों भीड़ से भरी सड़क पर चंद गुंडे आकर किसी की हत्या कर देते हैंकिसी महिला के साथ बलात्कार कर देते हैंपर कोई कुछ नहीं बोलतालोग चुपचाप आँखें नीची किए बैठे रहते हैंवो खुद को अपने आसपास बनाए "गर्भ" में सुरक्षित महसूस कर रहे होते हैं। पर क्या सच में वो सुरक्षित होते हैंएक दिन यही भीड़ उनके सामने आकर खड़ी हो जाती है तब उन्हें अपनी वास्तविकता का अहसास होता है। इसी पर वो गर्भ में बैठा बच्चा बोलता है कि क्या मैं इस गर्भ में सुरक्षित हूँक्या भरोसा इन हत्यारों काकब ये छेनी-हथौड़ा लेकर आएं और मुझे इस गर्भ में ही मार दिया जाए। जाने कितने ही बच्चों को को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। इस नाटक के जरिए श्री मंजुल भारद्वाज नेजातिवादभाषावादसम्प्रदायवादराष्ट्रवादभीड़तंत्रभ्रूणहत्या जैसी अनेक मानवीय त्रासदियों के नीचे पिस रही मानवता के दर्द को उभारकर हमारे सामने रखा हैऔर साथ ही साथ जीवन को एक अलग दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया है। ये नाटक मनुष्य को दूसरे मनुष्यों और प्रकृति से जोड़ने का काम भी करती है। हर मनुष्य का एक सपना होतावो प्रेम करना चाहता हैखुशियां बांटना चाहता हैस्वछन्दउन्मुक्त होकर अपने जीवन को जीना चाहता हैये नाटक हमें हमारे वास्तविक सपनों से जोड़ता हैजीवन की सुंदरता से हमें रूबरू कराता है।

दूसरा नाटक जिसपर हमने काम किया वो था "अहनद-नाद (Unheard Sounds of Universe)"!
ये नाटक हमें अपने अंदर की उन आवाजों को सुनने के लिए प्रेरित करता हैजिन्हें हम जीवन की आपाधापी में सुन नहीं पाते हैं या सुन कर भी अनसुना कर देते हैं। जन्मस्थान के आधार पर हमें एक बोलीएक भाषा दे दिया जाता है और फिर हमारा जीवन उसी भाषा से संचालित होने लगता है। हमारे जीवन की दशा और दिशा इसी से तय होने लगती है और हम जाने-अनजाने में किसी और के इशारों पर संचालित होने वाली मशीन बन कर रह जाते हैं। हमें लगता है कि हम जो काम कर रहे हैं वो अपनी मर्जी से कर रहे हैंया उस काम को करना हमारी जरूरत है मगर वास्तविकता में हम किसी और के इशारों पर नाच रहे होते हैं। और फिर जब इसके परिणाम उल्टे निकलते हैं तो उसके लिए हमें भाग्य को दोष देना सिखाया जाता है। इंसान असफल हो जाता है तो कहता है कि अरे वो तो मेरी किस्मत में ही नहीं था तो कहाँ से मिलता। कोई ये नहीं बोलता कि इस काम को शुरू करने से पहले मैंने अपने दिल की आवाज को अनसुना कर दिया था! वो तो चीख चीख कर मुझसे कह रही थी नहीं तुम इस काम के लिए नहीं बने हो। मगर हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को दबा कर दुनिया की भेड़चाल में शामिल हो जाते हैं और जब असफलता हाथ लगती है तो किस्मत को दोष देते हैं या अवसाद ग्रसित होकर खुद को दोष देने लगते हैं। साथ ही साथ ये नाटक हमें प्रकृति की उन आवाजों से जोड़ता  है जिन्हें हम अनसुना कर देते हैं। दरअसल श्री भारद्वाज ने ये नाटक मराठी रियल्टी शो " महाराष्ट्र का सुपरस्टार" की विजेता 'योगिनी चौकके लिए लिखा था। इस रियल्टी शो को जीतने के बाद मानव जीवन के सही उद्देश्य और मायनों की तलाश में भटकते हुए वो शांतिवन में'थिएटर ऑफ़ रेलेवंसकी कार्यशाला में आ पहुंची। उन्हें उम्मीद थी की इस कार्यशाला में बहुत से लोग होंगेगहमागहमी होगीचकाचौंध होगी! मगर उन्होंने देखा कि यहाँ तो बस गिने चुने 8-10 लोग हैं। उन्हें लगा कि बस इतने ही लोगफिर यहाँ कार्य करते हुए उन्हें यह अहसास हुआ कि वो तो यहां खुद को ढूंढने आई हैं और खुद को ढूंढने वालों को भीड़ से क्या काम। शांतिवन एक जंगल है और यहाँ पर रहते हुए उन्हें प्रकृति से मानव के जुड़ाव को महसूस किया। यहाँ उन्होंने प्रकृति में व्याप्त उन आवाजों को सुना जिन्हें आम जीवन में हम अनसुना कर देते हैं। शांतिवन में रहते हुए मैंने भी उन आवाजों को महसूस किया जो मन-मस्तिष्क में एक कम्पन पैदा करती हैं। चिड़ियों का चहचहानाघास में रेंगते जीवों की सरसराहटमस्ती में झूमते वृक्षों की आवाजेंसमीप में बह रही नदी की आवाज,रात में जंगल में चमक रहे जुगनुओं की सुंदरता। इन सब के बीच अपने होने का वो अद्भुत अहसास! शांतिवन में जीवन की खूबसूरती छलक छलक कर सामने आती है। शांतिवन के इन अहसासों में'योगिनी चौकको मानव जीवन का वास्तविक अर्थ समझ में आयाऔर उनके जीवन में बदलाव का एक नया दौर शुरू हुआ। खुद इन बदलावों पर चर्चा करते हुए वो बताती हैं कि अभी उन्हें एक रियल्टी शो में जज की भूमिका निभाने के लिए बुलाया गया था। वहां पर उन्हें वही हमारे समाज की  पितृसत्तात्मक सोच का अनुभव हुआ कि महिलाएं तो सिर्फ ग्लैमर के लिए होती हैंउनका काम बस श्रृंगार करनाकमर मटकाना और भीड़ की ओर हवाई चुम्बन उछालना होता है। जब उनके बोलने की बारी आई तो उन्होंने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने वहां पर बोला कि महिलाओं का काम ग्लैमर उत्पन्न करना या अंगों का प्रदर्शन करना नहीं है। उनका दर्जा इस सब से कहीं ऊपर है और लड़कियां लड़कों से किसी भी रूप में कम नहीं हैं। और फिर जो तालियां बजींउसमे उन्हें एक शोर के बजाये जीवन के  संगीत का आभास हुआ। उन्होंने उस परिवर्तन को महसूस किया जो 'अहनद-नादऔर 'थियेटर ऑफ़ रेलेवंसउनके जीवन में लेकर आया था। यहाँ उन्होंने अपने अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना सीखा था और आज उस आवाज को वो पूरे दुनियां के साथ साझा कर रही हैं।

इन नाटकों के जरिये श्री मंजुल भारद्वाज ना सिर्फ़ लोगों को अपने मन की आवाज सुनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं बल्कि उन्हें प्रकृति से भी जोड़ रहे हैं। 'गर्भनाटक पर जब हम काम कर रहे थे उस दौरान वो हमें समीप में ही बह रही नदी के किनारे लेकर गए। उन्होंने हमें उस माहौल को महसूस करने और अपने विचार रखने को कहा। वैसे तो मैं नदीपहाड़ आदि प्राकृतिक स्थलों पर कई बार गया था मगर इस बार का अनुभव कुछ अलग थाकुछ ख़ास था। मैंने उस दृश्य को अपनी नजरों से पढ़ा। मैंने देखा कि नीचे नदी में पानी एक साथ एक प्रवाह में बह रही हैऔर वो सतह पर उभरे विखंडित पत्थरों से संघर्ष करते हुएउन्हें हराते हुए आगे बढ़ रही है! फिर सामने की ओर देखामैंने पाया कि वहां पर पत्थरों ने एकजुट होकर विशालकाय पहाड़ का रूप ले लिया हैऔर पानी बादलों के रूप में विखंडित होकर उसकी चोटी को ढकने का प्रयास कर रहा हैअर्थात पानी और पत्थर का संघर्ष वहाँ आसमान में भी जारी है। मगर जहां धरती पर पानी अपनी एकता के कारण पत्थरों को चीकर आगे निकल रहा है वहीं आसमान में वो बादल बनकर विखंडित हो पहाड़ की चोटी पर एक ताज की तरह सज कर उसकी सुंदरता को बढ़ा रहा है । इससे हमें एकता और सार्थकता की ताकत का पता चलता है और ये समझ में आता है कि प्रकृति किस तरह से हमें शिक्षा देने की कोशिश करती है मगर हम उसकी आवाज को अनसुना कर देते हैं। यही वो भाषा है जिसका जिक्र श्री भारद्वाज ने अपने नाटक 'अनहद-नादमें किया है। जिसे हम जीवन की आपाधापी में सुन ही नहीं पाते हैंया सुनकर अनसुना कर देते हैं। इसी तरह आखरी दिन जब हम 'अहनद-नादनाटक को प्रस्तुत कर रहे थे तो वहां पर लगभग 20 ताइवानी विद्यार्थी आ गए। हिंदी ना आने के बावजूद भी उन्होंने इस नाटक को पूरा देखा। बाहर बारिश हो रही थी। इस नाटक के ख़त्म होते ही श्री भारद्वाज हम सभी को लेकर दौड़ते हुए बाहर आ गए और इस बारिश में भीगने का अहसास ही कुछ अलग था। एक बरसात बाहर हो रही थी जो हमारे तन को भिगो रही थी तो दूसरी बरसात हमारे अंदर हो रही थी जो हमारे मन को भिगो रही थीऔर हमारे अंदर और बाहर का सारा कचरासारी गंदगी छन छन कर बाहर निकल रही थी। ऐसे तो जानें कितनी ही बरसातों में हम भीगे होंगे मगर इस बार की बारिश बहुत अलग थीबहुत ख़ास थी।
 प्रकृति से जुड़ने और अपनी आंतरिक अवस्था से जुड़ने के लिए हम रोज सुबह चैतन्य अभ्यास करने जाते थे! पहले दिन हम ये अभ्यास करने एक पुल पर गएनीचे नदी में पानी अपने सम्पूर्ण प्रवाह में थाऔर ऊपर स्थिर पुल पर हम चैतन्य अभ्यास कर रहे थे। ये अभ्यास हमारे आंतरिक मन को झकझोर रहा थाजीवन को एक सार्थकता प्रदान कर रहा था। दरअसल मानव जीवन भी इसी तरह से काम करता हैहमारे नीचे धरती घूमती रहती हैसमय अपनी ही प्रवाह में गुजरता जाता है और ये हम पर निर्भर करता है मानव शरीर रूपी इस पुल में रहते हुए हम अपने जीवन को यूँ ही गंवाते हैं या किसी सार्थक काम में लगाते हैं। इसी तरह एक सुबह हम लगभग पांच किलोमीटर की सैर पर गए। दरसअल मुझे इसकी आवश्यकता थी और इस बात को अश्विनी ने श्री भारद्वाज तक पहुंचा दिया। इस यात्रा के दौरान साथियों ने अपने एक पुराने अनुभव को साझा किया कि बरसात के मौसम में इन पगडंडियों पर 15-15 फिट ऊँची जंगली घास उग आती हैंरास्ते का कुछ अता-पता नहीं चलता,सांपअजगर और अनेकों ज़हरीले प्राणियों का खतराउफनती नदी और इस जंगल को उन्होंने आपसी सहयोग सेएक दूसरे की मदद करते हुए पार किया था। अपने जीवन में हम दर्द से कितना डरते हैं जबकि हमारे जीवन की शुरुआत ही दर्द के साथ होती है। वो दर्द ही है जो मानव को मानव बनाता है और उन्हें आपस में जोड़ता है। आखरी दिन के चैतन्य अभ्यास के बाद श्री भारद्वाज ने हमें आँखे बंद कर के लेटने और जीवन के उन स्वरूपों के बारे में सोचने को कहा जिन्हें हमने पिछले पांच दिनों में जीया था। और हमारे सामने कितनी ही छवियां घूम गईंबारिश में भीगते बालक की छवि,सांस्कृतिक क्रान्ति लाने को उत्सुक एक कलाकार की छविमानवीय संवेदनाओं को समझते हुए एक प्रकृति प्रेमी की छविकभी साथियों से सीखते हुए एक विद्यार्थी की छवि तो तो कभी साथियों को समझाते हुए एक शिक्षक की छवि। यही तो है 'अहनद-नादनाटक का सारहमने यहाँ ना सिर्फ़ 'अहनद-नादको पढ़ाउसे समझाउसपर अभिनय किया बल्कि उसे प्रत्यक्ष रूप में  जीया।

'थियेटर ऑफ़ रेलेवंसकी कार्यशाला की सबसे महत्वपूर्ण और ख़ासबात यही है यहाँ सिर्फ़ नाटकों के स्क्रिप्ट को पढ़ना और उसमे अभिनय करना ही नहीं सिखाया जाता है बल्कि साथ ही साथ यहाँ कलाकारों के जीवन कोव्यक्तिगत अनुभवों को भी सुना और पढ़ा जाता हैऔर उसे प्रकृति के साथ जोड़ा जाता है। यहाँ पर कलाकार सिर्फ़ नाटक की पंक्तियों को नहीं पढ़ता है बल्कि एक दूसरे के जीवन को भी पढ़ता है। यहां हमने एक दूसरों को अपने जीवन की व्यक्तिगत अनुभवों को सुनाउसपर खुलकर चर्चा की जिससे जीवन के अनेक आयाम खुलकर सामने आए। यहाँ सबको अपनी बात खुलकर सामने रखने का पर्याप्त मौका दिया जाता है। यहाँ पर जिंदगी में शान्ति और सामंजस्य की तलाश में अमित आए थेउन्होंने अपने जीवन के अनुभवों के बारे में बतायावो सिटी बैंक में काम करते थेउनके पास पैसा थाघर थाउन्होंने प्रेम विवाह किया था पर माँ और पत्नी के बीच अनबन के कारण ये विवाह लगभग 10 साल बाद टूट गयाउन्होंने माँ और पत्नी की इस लड़ाई में आखिर में माँ का साथ दिया और पत्नी से अलग हो गए। श्री भारद्वाज ने उन्हें जीवन में भावनाओं के सामंजस्य के बारे में बताया। उन्होंने उन्हें समझाया की किस तरह वो आपसी चर्चा और कोशिशों से इस विवाह विच्छेद को बचा सकते थे।चर्चा के दौरान उन्होंने एक बार अमित से सामने की दीवार गिराने को कहाअमित ने पूरा जोर लगाया मगर असफ़ल रहा। फिर उन्होंने अमित से कहा कि तुम मुझे ऐसा करने को कहोअमित ने ऐसा ही किया। उन्होंने तुरंत फोन निकाल कर बोला कि अभी बुल्डोजर मंगवाता हूँदीवार गिर जायेगी। दरअसल हम अपने जीवन में भी यही करते हैंजो काम सूझबूझ सेआपसी सामंजस्य से हो सकता हैउसमे निरर्थक ही ताकत लगाते हैं और खुद को चोटिल कर लेते हैं।  'अनहद-नादनाटक पर चर्चा के दौरान कॉर्पोरेट जगत से जुड़े रहने वाले अमित ने कहा कि'जीवन में हमें पैसों की आवश्यकता भी तो पड़ती है उसके बगैर हम जी कैसे सकते हैं।जाहिर है कि होश संभालने के साथ ही हमें ये सिखाया जाता है कि पढ़ो लिखोआगे चल के तुम्हें बड़ा आदमी बनना हैढेर सारा पैसा कमाना हैऔर हम अपने जीवन को इस अंधी दौड़ में झोंक देते हैं। इस विषय पर चर्चा के दौरान हमारे सामने एक नया आयाम खुला कि आखिर मानव जीवन को जीने और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कितने पैसों की आवश्यकता होती हैऔर क्या पैसा कमाना ही सब कुछ हैदरसअल पैसा कमाने की इस होड़ में आज मानवीय संवेदनाएं कहीं पीछे छूट गई हैं। अश्विनी का कहना था हम कला के जरिए मानव कमा रहे हैं। ऐसे दोस्त बना रहे हैं जो वक़्त पड़ने पर हमारा साथ देते हैं। और ऐसा नहीं है कि कला से घर नहीं चलता! श्री भारद्वाज ने अपने अनुभव से हमें बताया कि उनका घर कला से चल रहा है और उनके जीवन की वास्तविक जरूरतें भी पूरी हो रही हैं। यहाँ मेरी मुलाकात संदीप से हुई जो वामपंथी संगठनों से जुड़े हैंऔर 'अहनद-नादनाटक की प्रस्तुति देखने के बाद यहां आए थेमहसूस होता था कि उन्हें भी एक सार्थक क्रांति की तलाश है।

 जिस क्रांति की तलाश में मैं भटक रहा थाउसे मैंने यहाँ घटित होते हुए देखा। 'अश्विनीने 'थियेटर ऑफ़ रेलेवंसके द्वारा किए गए नाटकों के दौरान आए अनुभवों और बदलावों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने नाटक 'छेड़छाड़ क्योंका प्रदर्शन एक कॉलेज कैंपस में कियाऔर इसके द्वारा उन लोगों ने उस कॉलेज में तीस विद्यार्थियों के एक दल को खड़ा कियाजो उस कॉलेज में छेड़छाड़ के खिलाफ लड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक बार उस कॉलेज की बस में एक लड़का एक लड़की के साथ छेड़छाड़ करने लगा। सामान्यतः ऐसी घटनाओं में बदनामी के डर से लड़कियाँ चुप हो जाती हैं या अपना रास्ता बदल लेती हैंमगर उस लड़की ने हिम्मत नहीं हारी और उस से लड़ गई। वो उसे घसीटते हुए प्रिंसिपल के कमरे तक ले गई और लड़के को सजा मिली। बाहर आकर उसने उस लड़की को देख लेने की धमकी दे दी। वो लड़की काफ़ी डर गई थी और उसने रोते हुए 'अश्विनीको फोन कर के सारी बात बताई। उसने तत्काल ही उन 30 लड़कों की टीम से उसका संपर्क कराया और उन लड़कों ने उस लड़की को पूरी सुरक्षा और सहायता प्रदान किया। ऐसे ही मुम्बई के एक स्लम में लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। छेड़छाड़बलात्कार जैसी घटनाओं के डर से उनके माता पिता उन्हें अपने ही घर में कैद करके रखते थे। 'थियेटर ऑफ़ रेलेवंसकी टीम वहां भी अपने नाटक का प्रदर्शन करने गई और उन लड़कियों के अंदर के आत्मविश्वास को जगाया। आज वो लड़कियां बाहर निकल रही हैंपढ़ाई कर पा रही हैं तो इसका पूरा श्रेय 'थियेटर ऑफ़ रेलेवंसके कलाकारों को जाता है। इसी प्रकार अपने एक अनुभव के बारे में कोमल बताती है कि उसके कॉलेज का टॉयलेट काफ़ी गन्दा रहता थाचारों ओर गन्दगी और सेनेटरी पैड्स बिखरे रहते थेनलों में पानी नहीं आता था। जब उसने इसकी शिकायत प्रिंसिपल से की तो उनका कहना था कि तुम यहां पढ़ने आती हो या टॉयलेट जानेसाधारणतः ऐसे जबाब सुनने के बाद लड़कियां चुप बैठ जाती हैंमगर उसने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक आंदोलन खड़ा कर दिया कि हाँ हम तो यहाँ टॉयलेट जाने ही आती हैंइसे साफ़ करो। आज वहाँ पूरी साफ़ सफाई हैटाइल्स लगे हैंनलों में पानी आता है। यही तो वह क्रांति है जिसे मैं इतने दिनों से खोज रहा थायही तो वो लोग हैं जो वास्तविकता में सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दे रहे हैसमाज में बिना कोई हंगामा कियेबिना कोई दिखावा किए परिवर्तन ला रहे हैं। पांच दिन के इस कार्यशाला के बाद अब मुझे लग रहा है कि हाँ अब मैं अपनी वास्तविक स्थान पर पहुंच गया हूँ। पांच दिनों की इस रंगशाला के बाद मेरे व्यक्तिगत जीवन में बहुत बदलाव आया हैअब प्रकृति कोजीवन को एक न दृष्टिकोण से देख पा रहा हूँ और मानवीय संवेदनाओं को भी ज्यादा अच्छी तरह से समझ पा रहा हूँ। मैंने रंगकर्म के क्षेत्र में कभी पूरी तरह से हाथ नहीं आजमाया थाऔर अश्विनीकोमलतुषार का गर्भ नाटक में अभिनय देख कर डर सा गया थाऔर सोच रहा था कि क्या मैं कभी ऐसा अभिनय कर पाउँगापर इन साथियों ने मेरे आत्मविश्वास को जगाया और और आज मैं एक नए उत्साह का अनुभव कर रहा हूँ।

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 ~विजय राजबली माथुर ©