Saturday, July 1, 2017

बेबसी (कहानी) ------ अनिता गौतम





Anita Gautam

बेबसी (कहानी) 
अनिता गौतम.
“मुबारक हो जय बाबू! नयी जिन्दगी बहुत बहुत मुबारक हो।”
आत्मविश्वास से भरे डॉक्टर अनिल के ये शब्द जय बाबू के कानों में पड़े तब उन्हें अपने जीवित होने का अहसास हुआ, अन्यथा हृदयाघात के दूसरे दौरे ने तो उन्हें लगभग मौत के आगोश में ही सुला दिया था।
जीवन और मृत्यु से जूझते जय बाबू के हृदय का ऑपरेशन सफलता पूर्वक हो जाने के बाद उनके कॉलेज के दिनों के सहपाठी रहे डॉ. अनिल ने आज उन्हें घर जाने की अनुमति दे दी थी। उनकी पत्नी एवं बेटे के चेहरे पर खुशी स्पष्ट झलक रही थी । उनकी पत्नी मोहिनी सर्वाधिक खुश थी, आखिर उसकी दिन रात की प्रार्थना ने उसके पति को यमराज के मुँह से वापस पाया था।
दिल की बीमारी ने 55-56 साल के जयबाबू को उनकी उम्र से ज्यादा ही बूढ़ा बना दिया था । एक राष्ट्रीय बैंक में शाखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत जयबाबू के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो बेटे, बहू एवं पोते पोतियां भी थे । कुल मिलाकर जयबाबू एक भरे पूरे परिवार के मालिक थे। इन सारी खुशियों के बावजूद उनके चेहरे पर सदैव एक दर्द की रेखा तैरती रहती थी, जिसका अहसास उनके बच्चों को कम उनकी पत्नी मोहिनी को हमेशे हुआ करती।
आज भी जयबाबू को घर लौटने की इजाजत मिल जाने के बावजूद उनके चेहरे पर अपेक्षित खुशी न देखकर मोहिनी ने पूछा ।
“ क्या बात है जी, आप हमेशे खोये खोये से क्यूं रहते हैं। मैं महसूस करती हूं कि आज हमारी शादी को करीब बत्तीस साल होने को आये लेकिन मैंने कभी भी आपको पूरी तरह से खुश नहीं देखा। यह अलग बात है कि आपको मुझसे भी कोई शिकायत नहीं है। आप परिवार का भी पूरा ध्यान रखते हैं, फिर ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको सबकुछ पाकर भी कभी खुश नहीं होने दिया।”
“ कोई बात नहीं मोहिनी, बस जरा सी तबीयत ठीक नहीं लग रही है, लेकिन चिन्ता की कोई बात नहीं, अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
जय बाबू ने मोहिनी को आश्वस्त किया।
“ माँ, मैं ट्रेन के प्रथम श्रेणी के तीन टिकट ले आया हूं। आज शाम हम सब वापस चल रहे हैं। घर पर भी मैंने सूचित कर दिया है। वहां भी सभी हमारा इंतजार कर रहे हैं।”
जय बाबू का छोटा लड़का रोहित जो उनके साथ ही दिल्ली तक उनका ऑपरेशन कराने आया था, को भी सकुशल अपने पिता को परिवार के बीच ले जाने की खुशी थी।
लगभग सारी तैयारिया हो चुकी थीं। ट्रेन रात के आठ बजे थी इसलिये तीन बजे तक सारे सामानों की पैकिंग के बाद जय बाबू मोहिनी एवं बेटे के साथ बिस्तर पर आराम की मुद्रा में लेटकर शाम होने का इंतजार कर रहे थे। तभी घबराये हुये डॉ. अनिल के साथ तीन चार नर्स एवं वार्डन एक वृद्ध महिला को स्ट्रेचर पर धकेलते हुये आपात कक्ष की तरफ तेजी से भागे चले जा रहे थे।
अनायास जब जयबाबू की नजर उस वृद्ध महिला पर पड़ी , उनके चेहरे पर कई भाव आते चले गये । उन आते जाते रंगों को सिर्फ मोहिनी ने अनुभव किया परंतु अफरा तफरी के बीच वह भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सकी।
हाँ, ये फरहीन ही थी, उनकी अपनी फरहीन जिसके साथ उन्होंने कभी साथ जीने मरने की कसमें खायी थी। कभी न तोड़ने के वादे किये थे और वे अतीत में खोते चले गये।
कॉलेज में फरहीन से वह पहली मुलाकात और थोड़ी नोक झोक के बाद दो विभिन्न धर्मों के बावजूद उन दोनों का प्यार परवान चढ़ता गया। 
आज के डॉ. अनिल तब उनके मददगारों में एक हुआ करते थे परंतु तमाम सहयोग के बाद भी अमीर पिता की एकलौती संतान फरहीन से उनकी शादी नहीं हो सकी थी। उन्हें अभी भी याद था वह दिन जब फरहीन के पिता से गिड़गिड़ा कर उन्होंने उसका हाथ मांगा था तथा वे अपना धर्म भी छोड़ने को तैयार थे। उनकी एक न सुनी गयी क्योंकि तब अंतरजातीय विवाह ही मुश्किल थे फिर यह तो दो संप्रदायों की बात थी। बहुत समझाने के बाद भी धर्म और मजहब की ऊँची दीवार के सामने उनका प्यार बौना पड़ गया और जिसे तोड़ पाने में फरहीन भी कमजोर पड़ गयी। कितने बेबस से हो गये थे वे।
कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो गयी और सभी दोस्त बिछड़ गये। फरहीन भी कहीं खो गयी। आज उम्र के इस पड़ाव पर जब शरीर भी उनका साथ छोड़ने को आतुर है, अनायास फरहीन उनके सामने थी। उनका जी चाहा, वे आगे बढ़कर उसे गले से लगा लें और सारे बंधन तोड़कर अपनी फरहीन को अभी भी अपना बना ले पर वे ऐसा नहीं कर सके। पत्नी और बेटे का अहसास उन्हें हुआ। लगा अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल गयी हैं और आज की मर्यादा की दीवार उस मजहब की दीवार से भी ज्यादा ऊंची है।
“पिताजी, आप कहाँ खो गये । डॉक्टर ने आपको ज्यादा सोचने के लिये मना किया है । ”
रोहित ने पिता को संभालते हुये कहा।
जय बाबू की तंद्रा टूटी और उनके चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान फैलती चली गयी।
मैं बिल्कुल ठीक हूँ। कहते हुये वे अपनी चारपायी से उठकर डॉ. अनिल के कक्ष की ओर बढ़ गये ।
काफी देर की बातचीत के बाद जब वे वापस आये तो मोहिनी ने उनके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी का अनुभव किया जिसके लिये वह पिछले कई सालों से तरस रही थी।
“वापस लौटने की सारी तैयारियाँ हो गयी”? जयबाबू ने मोहिनी से पूछा ।
हाँ, क्यों अभी चलने की इच्छा नहीं है क्या ?
मोहिनी ने आश्चर्य से पूछा।
“हाँ मोहिनी, यदि हमलोग आज नहीं जाकर दो तीन दिनों बाद चले तो कैसा रहेगा।”
जयबाबू ने आग्रह भरे शब्दों में मोहिनी से कहा।
“ क्या… टिकट कराये जा चुके हैं। सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं और फिर घर पर सभी हमारा इंतजार भी कर रहे हैं।”
मोहिनी ने चौंकते हुये कहा।
“ प्लीज मोहिनी, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है और फिर मैं अभी अभी डॉ. अनिल से मिल कर आ रहा हूँ। उन्होंने भी अभी लंबी यात्रा से मना किया है। दो दिनों की तो बात है।”
जय बाबू बच्चों की तरह अपनी बात दोहराते चले गये।
आज पहली बार अपने पति के चेहरे पर खुशी के भाव को महसूस कर मोहिनी खामोश हो गयी और उसने लगभग अपनी मौन स्वीकृति दे दी।
बिस्तर पर पड़े जय बाबू के पास बैठी मोहिनी उनके दर्द से बेखबर इस बात पर संतुष्ट थी कि नयी जिंदगी के साथ उनकी खुशियाँ भी लौट आयी हैं।
डॉ. अनिल ने जयबाबू को अपने पास बुलाया और दोनो घंटो बातें करते रहे। जयबाबू ने डॉ अनिल से फरहीन से संबधित कई सवाल पूछे। उन्हें आश्चर्य था कि फरहीन भी दिल की मरीज थी पर उसके साथ कोई नहीं आया था। पूछने पर डॉ. अनिल ने उन्हें बताया कि फरहीन ने तुम्हारे जाने के बाद शादी ही नहीं की। अपने पिता के लाख समझाने के बावजूद वह किसी और से निकाह करने को तैयार नहीं हुयी। अपने पिता द्वारा छोड़ी गयी अकूत संपत्ति भी उसने इस अस्पताल के नाम कर दी और अब हम सब लोग ही उसकी देखभाल करते हैं।
सारी बातें सुनकर जयबाबू का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया और उनकी आँखें श्रद्धा से झुक गयीं। उन्हें अपनी बेबसी पर तरस आ रहा था।
… फरहीन तुम धन्य हो।
अपनी डबडबायी आँखों को पोछने के बाद जय बाबू बुदबुदाते चले गये।
शाम में फरहीन का ऑपरेशन था। डॉ. अनिल ने जयबाबू को कंधे से थपथपाया और आशा भरी मुश्कान बिखेरते हुये कहा-“ धीरज रखो , सब कुछ ठीक हो जायेगा। मैंने तुम्हे ठीक कर दिया , उसे भी ठीक कर दुँगा, ” और ऑपरेशन कक्ष की ओर बढ़ चले।
उदास से जयबाबू अपनी पत्नी के पास बैठ गये। उनके अचानक गंभीर हुये चेहरे को देखकर मोहिनी घबरा गयी। उसने उनके दिल की बात जानने की बहुत कोशिश की परंतु जिस काम में वह पिछले बत्तीस सालों में सफल नहीं हो सकी वह भला आज कैसे सुलझती ।
दूसरी सुबह आँख खुलते ही जयबाबू की आँखें डॉ. अनिल को तलाश रही थी। उन्हें आश्चर्य था कि डॉ. अनिल ने फरहीन के लिये उन्हें मुबारक बाद क्यों नहीं दी, जैसा उनके नये जीवन पर दिया गया था। अचानक उनका चेहरा भयाक्रांत हो गया, परन्तु फिर उन्होंने डॉ. अनिल की कुशलता पर पूरा भरोसा कर अपने आप को संभाला।
“कैसे हैं जयबाबू, डॉ. अनिल ने पीछे से आवाज दी।
“मैं ठीक हूँ, तुम वह बताओ जो मैं जानना चाहता हूँ”। डॉ. अनिल से थोड़ा रुठते हुये जयबाबू ने पूछा।
डॉ. अनिल जजबात में बहकर यह भूल गये कि अब जयबाबू वे जय बाबू नहीं हैं जो कभी उनके साथ कॉलेज में पढ़ा करते थे। आज इतने सालों बाद वे भी एक मरीज की तरह उनसे रुबरु हुये हैं।
“आई एम सॉरी जय, कल रात चले चार घंटों के लंबे ऑपरेशन के बाद फरहीन ने एक बार अपनी आँखे खोली और सिर्फ तुम्हारे बारे में इतना कहा कि, मेरा जय मुझे इस जन्म में नहीं मिला मैं आगे भी उसका इंतजार करुंगी।” और उसने दम तोड़ दिया ।
“ मुझे माफ कर दो जय, मैं तुम्हारी फरहीन को नहीं बचा सका। ” डॉ. अनिल की आखों में कहते कहते आँसू छलक आये और उन्होंने अपनी नजरे घुमा ली।
“क्या… मेरी फरहीन मर गयी। ”
जयबाबू चौंक पड़े, अनायास उन्हें डॉ. अनिल की बातों पर यकीन नहीं हुआ।
“मेरी फरहीन अभी भी मेरा इंतजार कर रही है । ”
जय बाबू बुदबुदा पड़े और उनकी आँखे पथराने लगीं।
तुमने इतने सालों तक मेरा इंतजार किया और मुझे भनक तक नहीं लगी। मैं भी वहाँ तुम्हारे पास आ रहा हूँ फरहीन, जहाँ धर्म, मजहब, समाज एवं मर्यादा जैसी कोई दीवार शायद नहीं है।
इन्हीं शब्दों के साथ दो हिचकियों के बीच जयबाबू का निर्जीव शरीर बिस्तर पर लुढ़क गया । 

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(जरूरी नहीं कि वही कहानी पढ़ी जाये जो किताबों में छपे, कभी हम जैसे लेखकों की डायरी में कैद कहानियों पर भी एक नजर डाल लें। साथ ही हो सके तो मेरी तस्वीर और मेरे नाम के साथ कही प्रकाशित भी कर दें। --- अनिता गौतम)
https://www.facebook.com/anita.gautam.39/posts/1387660011322967


'बेबसी ' कहानी अनीता जी की वेबसाईट पर कई वर्ष पूर्व पढी थी. वर्तमान सामजिक माहौल में इसका महत्व व् उपयोगिता और अधिक  महसूस होती है.  
~विजय राजबली माथुर 
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2 comments:

सोमेश सक्सेना said...

भावुकता थोड़ी ज़्यादा है, पर कथानक अच्छा है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-07-2016) को "ब्लॉगिंग से नाता जोड़ो" (चर्चा अंक-2653) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'