Sunday, September 17, 2017

कई डिग्रियां हैं, पर व्यावहारिक बुद्धि की भरपूर कमी : ‘एजुकेटेड इल्लिट्रेट’, ‘पढ़ा-लिखा गंवार’ ------ दाराब फ़ारूक़ी

  एक अंग्रेज़ी का वाक्यांश है ‘एजुकेटेड इल्लिट्रेट’, जिन्हें हम ‘पढ़ा-लिखा गंवार’ कहते हैं. ये वो हैं जिनके पास कई डिग्रियां हैं, पर व्यावहारिक बुद्धि की भरपूर कमी है. ये लेफ्ट में भी हैं और लिबरल्स में भी. पर राइट विंग में इनकी मात्रा सर्वाधिक है.




BY 
16-09-2017

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अभी कुछ दिन पहले बताया कि जीडीपी ग्रोथ का गिर कर 5.7 प्रतिशत पर आ जाना, एक ‘टेक्निकल रीज़न’ है. बड़ा गुस्सा आया. लगा क्या ये आदमी हमें बेवकूफ समझता है?

फिर सोचा कि सही ही समझता है. आख़िर हमारे ही देशवासियों ने ही इन्हें वोट देकर वहां पर पहुंचाया है. मैंने बचपन में सीखा था, जब रो नहीं सकते तो हंस लो. ग़म कम हो न हो, बुरा कम लगता है.--------------------------
किसी भी बहस को जीतना बड़ा आसान है: पर्सनल अटैक कीजिए, जुमलों में बात कीजिए, ऐसी बात कीजिए जिस पे तालियां पड़े, टॉपिक से हट कर किसी और इमोशनल इश्यू को उठा दीजिए.

कई तरीके हैं बहस जीतने के, सबको पता हैं. लेकिन इन पढ़े-लिखे गंवारों को बस ये नही पता है कि जब भी कुतर्क जीतता है तो देश हार जाता है. देश का भविष्य हार जाता है.

चाहे वो राष्ट्र निर्माण हो या राष्ट्र मंथन, हमारे पास बस एक हथियार है… तर्क. और जब कुतर्कों के बादल घिरे हो तो बेवकूफ़ी की बरसेगी. आज-कल भारत में बेवकूफ़ी का घुटनों-घुटनों कीचड़ है. किसी भी आज़ाद ख़्याल का यहां चलना मुश्किल हो गया है.
आप ख़ुद सोचिए:

जिस देश में 25-30 प्रतिशत लोग भूखे सोते हों, वहां बुलेट ट्रेन की क्या ज़रूरत है? क्या ज़रूरत है हज़ारों करोड़ के स्मारक बनाने की?
जहां लाखों किसान आत्महत्या कर रहे हैं, वहां हज़ारों-लाख का कॉरपोरेट कर्ज़ा माफ हो रहा है?
ऐसी जीडीपी ग्रोथ का क्या फ़ायदा जिसमें करोड़ों युवाओं के लिए नौकरी न हो?
ऐसे राष्ट्रवाद का क्या फ़ायदा जिसमें तुम अपने ही देश के भाई को शक़ की नज़र से देखने लगो?
जब आपके-हमारे बच्चे न स्कूल में सुरक्षित हो न अस्पताल में?
सवालों की लिस्ट बहुत लंबी है पर सारे सच्चे सवाल सारे जान और माल से जुड़े हैं. हमारी आम ज़िंदगी से जुड़े हैं. हमें एक खेल में लगा दिया गया है, आओ आज इसपे उंगली उठाए, आज उसपे. बचपना चल रहा है. टीवी, अख़बारों, गली-मोहल्लों में जैसे सब छुपन-छुपाई खेल रहे. हर एक को किसी न किसी को थप्पी मारनी है.

मुझे तो ये भी लगने लगा है कि शायद अमित शाह ने सही कहा. कुछ तो हमारी सोच में ही टेक्निकल फॉल्ट हो गया है और पूरे देश में जैसे ‘टेक्निकल रीज़न’ का सीज़न चल रहा है. देश में टेक्निकल रीज़न की महामारी फैली है और जो तर्क अमित शाह ख़ुद नहीं दे पाए, वो मैं आपको दे देता हूं.

अगर आपको लगता है कि जीडीपी के गिरने के पीछे ‘टेक्निकल रीज़न’ है और आपके दिमाग में इस बात को सुनने के बाद कोई सवाल नहीं उठता है. तो प्लीज़ अपने दिमाग की टेक्निकल वायरिंग चेक करा लीजिए क्योंकि ‘टेक्निकल रीज़न’ आप ख़ुद हैं.
अगर आप ठीक हो गए तो देश के सारे टेक्निकल रीज़न ठीक हो जाएंगे और सारे तर्क भी. सच मानिए अगर आपके तर्क ठीक हुए तो भारत का भविष्य सच में ठीक हो जाएगा. ‘हिंद’ सच में ‘जय हिंद’ हो जाएगा…

(दाराब फ़ारूक़ी पटकथा लेखक हैं और फिल्म डेढ़ इश्किया की कहानी लिख चुके हैं.)

साभार : 
http://thewirehindi.com/18755/bjp-amit-shah-narendra-modi-government/

~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, September 16, 2017

राजनीतिक विकल्प क्या और कैसा ? ------ विजय राजबली माथुर





यह भारत के लिए विडम्बना ही है कि, वामपंथ की सबसे पुरानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जब प्रथम आम चुनावों के जरिये ही लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में सामने आ गई थी और बाद में केरल में चुनाव के जरिये ही सत्ता में भी आ गई थी तब ' यह आज़ादी झूठी है .....' का नारा लगा कर तेलंगाना में सशस्त्र आंदोलन चला दिया गया। इसे कुचलने के लिए विनोबा भावे के नेतृत्व में 'भूदान ' आंदोलन खड़ा किया गया और कम्युनिस्टो का पुलिसिया दमन भी किया गया। 1964 में एक तबका CPM का गठन करके अलग होगया जिसके शीर्ष नेताओं बी टी रणदिवे और ए के गोपालन का कहना था कि, हम संविधान में घुस कर संविधान को तोड़ देंगे(उनकी इस उक्ति पर मोदी सरकार तन्मयता से आगे बढ़ रही है )।  लेकिन बंगाल में 35 वर्ष के शासन में इस पार्टी को वहाँ ' बंगाली पार्टी ' के रूप में समर्थन मिलने के कारण और ब्राह्मण वादी प्रभुत्व के चलते यह पाखंड तक को नहीं तोड़ पाई और इसके शासन में भी सारे आडंबर बदस्तूर चलते रहे । पुनः 1967 में नक्सल बाड़ी आंदोलन के रूप में यह भी विभाजित हो गई थी और आज वामपंथ की स्थिति केले के तने की परतों की तरह विभिन्न अलग - अलग पार्टियों के रूप में सहजता से देखी जा सकती है। जब कारपोरेट के एक तबके से इसने सम्झौता किया तब कारपोरेट के दूसरे तबकों ने मिल कर इसे सत्ता से बेदखल करने में सफलता प्राप्त कर ली है। 
आज CPM ममता बनर्जी से उसी प्रकार की एलर्जी रख रही है जैसी मायावती  मुलायम सिंह से रखती रही हैं। लेकिन कम्युनिस्टों को बंगाल की खाड़ी में फेंकने का 2011 में ऐलान करने वाले राहुल गांधी की पार्टी से 2016 में सम्झौता करके जोरदार पटकनी खा ली लेकिन फासिस्ट / सांप्रदायिक भाजपा को टक्कर देने के लिए अब भी ममता बनर्जी से हाथ मिलाने को तैयार नहीं हैं । 27 अगस्त 2017 की पटना  रैली में ममता बनर्जी की उपस्थिती के कारण ही CPM ने भाग नहीं लिया और CPIML के महासचिव भी नहीं पहुंचे। 
सोनिया कांग्रेस के पी एम रहे मनमोहन सिंह जी को जब 2012 में राष्ट्रपति बनाने ( और प्रणव मुखर्जी को पी एम ) की चर्चा चली तब उनके द्वारा तीसरी बार भी पी एम बनने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की गई और आश्वासन न मिल पाने पर 2011 में हज़ारे, केजरीवाल,रामदेव आदि के माध्यम से सोनिया कांग्रेस विरोधी आंदोलन खड़ा करा दिया गया ( वह भी तब जबकि वह USAमें इलाज कराने गईं हुईं थीं। ) जिसकी परिणति वर्तमान मोदी सरकार है। 
राहुल गांधी द्वारा मोदी विरोधी मुहिम शुरू करने पर तमाम लोग कयास लगाने लगे हैं कि, वह भावी पी एम पद के दावेदार हैं क्योंकि वे इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि, न ही राहुल और न ही प्रियंका कभी पी एम पद के लिए दावेदार बनेंगे क्योंकि उन पर उनकी ननसाल का दबाव है कि, वे यह पद न लें। वरना 2004 में सोनिया जी ही पी एम न बन जातीं और मोदी के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले मनमोहन जी सामने आ ही नहीं पाते। 
शरद यादव ने ' साझी विरासत ' अभियान तो ज़रूर छेड़ा है और वह किसी 
इल्जाम से भी नहीं घिरे हैं उनमें विभिन्न नेताओं और दलों को एकजुट करने की क्षमता भी है किन्तु उनके पी एम पद को जन - समर्थन नहीं मिल पाएगा। यदि वास्तव में मोदी और उनकी पार्टी को चुनावों में  जन - समर्थन से परास्त करना है तो इस  हेतु सम्पूर्ण वामपंथ समेत सभी वर्तमान विपक्षी दलों को संयुक्त रूप से ममता बनर्जी को नेतृत्व देना चाहिए अन्यथा सारी कवायद बेकार हो जाएगी और फासिस्ट और ज़्यादा शक्तिशाली होकर सत्ता में वापिस आ जाएँगे। तब उनके विरुद्ध एकमात्र सशस्त्र संघर्ष ही विकल्प बचेगा जैसी कि , आशंका   'नया जमाना ' , सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' ने 1951 में आर एस एस प्रचारक लिम्ये साहब का साक्षात्कार लेते हुये उनसे व्यक्त की थी। 
सशस्त्र संघर्ष के जरिये फासिस्टों को सत्ताच्युत करने पर जो सत्ता स्थापित होगी वह भी जन - तांत्रिक नहीं होगी। अतः वर्तमान संविधान व जनतंत्र की रक्षा का तक़ाज़ा है कि, संसदीय लोकतन्त्र समर्थक वामपंथी अन्य सभी विपक्षी दलों के साथ आंतरिक एकता स्थापित करने से पीछे न छूटें। जो दल और व्यक्ति डॉ अंबेडकर का अनुयाई होने का और उनके संविधान निर्माता होने का दावा करते हैं उनका सर्वाधिक दायित्व बनता है कि, वे तमाम अन्य दलों को भाजपा के विरुद्ध लामबंद करने में अपने कर्तव्य का पालन करें तभी डॉ अंबेडकर के संविधान की रक्षा हो सकेगी। 












~विजय राजबली माथुर ©

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Friday, September 15, 2017

सत्ता की धौंस ने छात्रों की आँखें खोलीं ------ विजय राजबली माथुर











 


इस वर्ष 2017 में भाजपा के छात्र संगठन  ए बी वी पी ने JNU में भी छात्र यूनियन पर कब्जा करने के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन व केंद्र सरकार के माध्यम से भरसक कोशिश की थी। किन्तु वहाँ तो दाल तब भी न गली बल्कि, दिल्ली यूनिवर्सिटी में जहां कि, चार वर्षों से उनका अध्यक्ष था वहाँ भी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर कांग्रेस  के छात्र संगठन NSUI ने जीत हासिल की है। ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर भी पहले NSUI को विजित घोषित करके अब ए  बी वी पी को निर्वाचित कर दिया जिसके लिए कोर्ट में मामला जा सकता है। ग्वाहाटी , पंजाब और रास्थान आदि में भी ए  बी वी पी को  को हरा कर NSUI के  छात्र जीते हैं। 
यही कारण है कि, कारपोरेट अखबार NBT के समपादकीय में भी भाजपा की धौंस की नीति की आलोचना हुई है। उनके एक संवाददाता को अलग से JNU के छात्र चुनावों पर रिपोर्ट देनी पड़ती है और द वायर हिन्दी पर वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ साहब को इस पर चर्चा के लिए पर्याप्त समय देना पड़ता है। 
अभी 05 सितंबर 2017 को सबसे पुराने छात्र संगठन AISF ( स्थापित 1936 ) के कन्याकुमारी से हुसैनीवाला तक जा रहे  लाँग मार्च को उत्तर - प्रदेश की भाजपा सरकार ने अनावश्यक रूप से बाधित किया था क्योंकि उसमें देश की एकता, सांप्रदायिक सौहार्द, रोजगार, समान शिक्षा आदि की मांग की जा रही थी जबकि, भाजपा विभाजनकारी उत्पीड़न की पक्षधर है । छात्र काफी समय से मोदी और उनकी भाजपा के छलावे में फंसे हुये थे अब यदि उनका भ्रम टूट रहा है तो यह देश के लिए आने वाले समय की सुखद सूचना ही है।  
  
 ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, September 14, 2017

1847 से प्रारम्भ हुआ बाहुबलियों का इस्तेमाल ------ कृष्ण प्रताप सिंह




 ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, September 3, 2017

सास बहू क्या ? क्या पति - पत्नी ? : सुखी कोई परिवार नहीं ! ------ विजय राजबली माथुर

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  इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार,  तथाकथित डेरों /  सत्संगों   जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं ।
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है। ऐसा न करने का  परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । । 











प्रिंस डी लेमार्क और डार्विन सरीखे जीव विज्ञानियों के 'विकास' एवं  'व्यवहार और अव्यवहार' सिद्धान्त के विपरीत यूजीन मैकार्थी द्वारा सूअर और चिम्पाजी को मानव का पूर्वज घोषित किया जाना 'विज्ञान' को हास्यास्पद ही बना रहा है। 'विज्ञान' सिर्फ वह ही नहीं है जिसे किसी प्रयोगशाला में बीकर और रसायनों के विश्लेषणात्मक अध्यन से समझा जा सकता है। मेरठ कालेज,मेरठ में 1970 में 'एवरी डे केमिस्ट्री' की कक्षा में प्रो.तारा चंद माथुर साहब  के प्रश्न के उत्तर में मैंने उनको विज्ञान की सर्वसम्मत परिभाषा सुना दी थी-"विज्ञान किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्यन को कहा जाता है" और उन्होने इस जवाब को सही बताया था।

'पहले मुर्गी या पहले अंडा?' :

वैज्ञानिकों के मध्य ही यह विवाद चलता रहा है कि 'पहले मुर्गी या पहले अंडा?' इस संबंध में मैं आप सब का ध्यान इस बात की ओर खींचना चाहता हूँ कि, पृथ्वी की सतह ठंडी होने पर पहले वनस्पतियाँ और फिर जीवों की उत्पत्ति के क्रम में सम्पूर्ण विश्व में एक साथ युवा नर एवं मादा जीवों की उत्पति स्वम्य  परमात्मा ने प्रकृति से 'सृष्टि' रूप में की और बाद में प्रत्येक की वंश -वृद्धि होती रही। डार्विन द्वारा प्रतिपादित 'survival of the fittest'सिद्धान्त के अनुसार जो प्रजातियाँ न ठहर सकीं वे विलुप्त हो गईं;जैसे डायनासोर आदि। अर्थात  उदाहरणार्थ पहले परमात्मा द्वारा युवा मुर्गा व युवा मुर्गी की सृष्टि की गई फिर आगे अंडों द्वारा उनकी वंश-वृद्धि होती रही। इसी प्रकार हर पक्षी और फिर पशुओं में क्रम चलता रहा। डार्विन की रिसर्च पूरी तरह से 'सृष्टि' नियम को सही ठहराती है।    
'युवा पुरुष' और 'युवा स्त्री' : 
मानव की उत्पति के विषय में सही जानकारी 'समाज विज्ञान' द्वारा ही मिलती है। समाज विज्ञान के अनुसार जिस प्रकार 'धुएँ'को देख कर यह अनुमान लगाया जाता है कि 'आग' लगी है और 'गर्भिणी'को देख कर अनुमान लगाया जाता है कि 'संभोग'हुआ है उसी प्रकार समाज विज्ञान की इन कड़ियों के सहारे 'आर्य' वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि अब से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व मानव की उत्पति -'युवा पुरुष' और 'युवा स्त्री' के रूप में एक साथ विश्व के तीन विभिन्न क्षेत्रों -अफ्रीका,मध्य यूरोप और त्रिवृष्टि=तिब्बत में हुई थी और आज के मानव उनकी ही सन्तानें हैं।  प्रकृति के प्रारम्भिक रहस्य की सत्यता की  पुष्टि अब तक के वैज्ञानिक दृष्टिकोणों से ही होती है।

आज से नौ लाख वर्ष पूर्व 'विश्वमित्र 'जी ने अपनी प्रयोगशाला में 'गोरैया'-चिड़िया-चिरौंटा,नारियल वृक्ष और 'सीता' जी की उत्पति टेस्ट ट्यूब द्वारा की थी। 'त्रिशंकू'सेटेलाईट उनके द्वारा ही अन्तरिक्ष में प्रस्थापित किया गया था जो आज भी सुरक्षित परिभ्रमण कर रहा है।  

वस्तुतः आज का विज्ञान अभी तक उस स्तर तक पहुंचा ही नहीं है जहां तक कि अब से नौ लाख वर्ष पूर्व पहुँच चुका था। उस समय के महान वैज्ञानिक और उत्तरी ध्रुव-क्षेत्र(वर्तमान-साईबेरिया)के शासक 'कुंभकर्ण'ने तभी यह सिद्ध कर दिया था कि 'मंगल'ग्रह 'राख़' और 'चट्टानों'का ढेर है लेकिन आज के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर 'जल' होने की निर्मूल संभावनाएं व्यक्त कर रहे हैं और वहाँ मानव बस्तियाँ बसाने की निरर्थक कोशिशों में लगे हुये हैं। इस होड़ा-हाड़ी में अब हमारा देश भी 'मंगलयान' के माध्यम से शामिल हो चुका है। सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के उत्थान-पतन के साथ-साथ वह विज्ञान और उसकी खोजें नष्ट हो चुकी हैं मात्र उनके संदर्भ स्मृति(संस्मरण) और किस्से-कहानियों के रूप में संरक्षित रह गए हैं। आज की वैज्ञानिक खोजों के मुताबिक 'ब्रह्मांड' का केवल 4 (चार)प्रतिशत ही ज्ञात है बाकी 96 प्रतिशत अभी तक अज्ञात है-DARK MATTER-अतः केवल 4 प्रतिशत ज्ञान के आधार पर मानव जाति को सूअर और चिम्पाजी  का वर्ण -संकर बताना विज्ञान की खिल्ली उड़ाना ही है प्रगतिशीलता नहीं।विज्ञान का तर्क-संगत एवं व्यावहारिक पक्ष यही है कि युवा नर और युवा नारी के रूप में ही परमात्मा-ऊर्जा-ENERGY द्वारा मनुष्यों की भी उत्पति हुई है और आज का मानव उन आदि मानवों की ही संतान है न कि सूअर और चिम्पाजी का वर्ण-संकर अथवा 'मतस्य'से विकसित प्राणी। यदि आज भी वेदोक्त ( पौराणिक - ढ़ोंगी - पाखंडी नहीं ) पद्धति का अनुसरण किया जाता तो घर- परिवार, समाज , राष्ट्र और सम्पूर्ण  विश्व में विग्रह व अशांति देखने को न मिलते। 


 ~विजय राजबली माथुर ©