Thursday, June 15, 2017

बिन अन्नदाता के क्या खाएंगे-पिएंगे न्यू इंडिया के न्यू नागरिक?............ नवेन्दु कुमार

  
Navendu Kumar
40 हज़ार करोड़ बनाम 5 लाख करोड़ !
बैंकों को कंगाल करने वाले बड़े फर्म मालिकों यानि बड़े पूँजीखोरों की फ़ाइल तो निकाली जा रही पर ऋण माफ़ी भी दी जा रही। जबकि भारतीय बैंकों का कुल एनपीए 6 लाख करोड़ से ज़्यादा पहुँच चुका है। दिलचस्प तथ्य और आंकड़े ये कि सिर्फ़ देश के बड़े औदौगिक घराने और बड़े पूँजीखोरों के पास 5 लाख करोड़ का कर्ज बर्षों से बकाया है जिस पर सरकार की नजरें इनायत है। इनायत अमीर भारतीयों के कर्ज माफ़ी की।
देश के प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्रियों तक राष्ट्र के ऐसे धन कुबेरों पर रहम बरसाते रहे। जबकि वहीं कर्ज़ और भूख से आत्महत्या कर रहे देश के किसानों के हिस्से के कर्ज माफ़ी पर निष्ठुर बनी रही हैं सरकारें। कांग्रेसी कल और भाजपाई आज में कोई फर्क नहीं आया। बल्कि आलम ये कि वर्तमान केंद्र सरकार की निष्ठुरता और भी अधिक बढ़ी है। 
माल्या लंदन से भी ललकार रहा है और सरकार दिल्ली से लेकर बंगलोर तक उसकी परिसंपत्तियों की केयर टेकर बनी हुई है। अभी-अभी भूषण स्टील को भी करोड़ों की माफी दे दी गयी। माफ़ी वाली पंगत में और भी पूँजीशाह पत्तल बिछाये बैठे हैं। वहीं किसान बर्बादी के कगार पर खड़े दम तोड़ रहे हैं। चार दिन पहले तीन किसानों की आत्महत्या की खबर मध्यप्रदेश और बुंदेलखंड से आई। ख़ुदकुशी करने वाला एक किसान तो मुख्यमंत्री के ही क्षेत्र का है।
अभी देश का संकट ये है कि ऐसी घटनाओं पर भी सरकार और अवाम के एक हिस्से में बहस ये हो रही है कि किसानों को भड़काया किसने। ये बहस नहीं हो रही कि किसान अपने खेत-खलिहान छोड़ सड़क पर आने को क्यों मजबूर है? क्यों मजबूर है वो लागतार खुदकुशी करने को? 
राजनीति में बंट चुका देश ये नहीं समझ पा रहा कि खुदकुशी करने या गोली खाने के बीच जी-मर रहे किसान को उसकी मुश्किलों से त्राण दिला सकती है तो सरकारें ही और उनकी किसान नीति। और किसान मर-मरा रहा तो इसकी ज़िम्मेदार भी हैं सरकारें और उनकी नीतियां।
अब लाल बहादुर शास्त्री को समझने वाला भारत रहा कहाँ जिसका नारा और नीति ही थी...जय जवान-जय किसान! अब तो आलम ये कि सरहद के तनाव और पाक मुकाबले की राजनीति में जवान भी मारे जा रहे और आंतरिक घरेलू कृषि नीतियों की वजह से किसान भी मर रहे या मारे भी जा रहे।
पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर तमिलनाडु के जिन किसानों के नंग धड़ंग धरने और कर्ज़ माफी की गुहार को लेकर जो हायतोबा मची वह रेड कार्पेट के नीचे दबा दी गयी। दिलचस्प ये भी कि इन तमिल किसानों पर महज 40 हज़ार करोड़ का कर्ज है, जिसकी माफ़ी की फरियाद लेकर ये दिल्ली पहुंचे थे। कांग्रेस की दिल्ली ने भी इनकी कभी नहीं सुनी थी और अब बीजेपी-मोदी की दिल्ली भी इनको सुनने को तैयार नहीं।

अलबत्ता सबका साथ सबका विकास वाली सरकार की रुचि और चिंता फिलहाल पूंजी घरानों के कर्ज माफ़ी पर है...क्योंकि भारत को न्यू इंडिया जो बनाना है! तो क्या अभी चल रहा मेकिंग इंडिया अभियान, गरीब और कर्ज में डूबे किसानों की इहलीला समाप्त करने का नया उद्यमिता शास्त्र तो नहीं बन जायेगा? काल का किसान रहित न्यू इंडिया जाने कैसा होगा? और बिन अन्नदाता के क्या खाएंगे-पिएंगे न्यू इंडिया के न्यू नागरिक?....यक्ष प्रश्न!!
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~विजय राजबली माथुर ©

''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' ------ नारी सम्मान


नारी सम्मान
14-06-2017  at 2:00pm
(((#एक_अनोखा__तलाक#))))......
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हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।
मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।
इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है। कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।
बुरी बातें चक्रवृत्ति ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही। 
मुकदमा दर्ज कराया गया। पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।
पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी। 
दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार। 
मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग, मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।
दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।
लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।
दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते। 
अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................
पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।
तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था। 
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया। 
यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।
लकड़ी की बेंच और वो दोनों .......
''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।
''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।
''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा। 
''तुम बताओ?'' 
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....
अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।'' 
''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला। 
''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।
''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।
स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा। 
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली और कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।'' 
''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली। 
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''
प्लास्टिक के कप में चाय आ गई। 
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी... की आवाज़ निकली। 
पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था। 
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?'' 
''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।
''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा। 
''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।
स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो। 
''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा। 
''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।
''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा। 
''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया। 
''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की।
पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।'' 
''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा। 
''वसुंधरा में फ्लैट है... तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' पुरुष ने अपने मन की बात कही।
''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया। 
''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा। 
''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली। 
''हाँ, ज़रूर दूँगा।'' 
''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा। 
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।
पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी। 
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे...
एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''
पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''
दोनों चुप थे, बेहद चुप। 
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश। 
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....
''मुझे एक बात कहनी है, '' उसकी आवाज़ में झिझक थी। 
''कहो, '' स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा। 
''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा। 
''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा। 
''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला। 
''तुम भी,'' स्त्री ने कहा। 
''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।'' 
''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।
दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं। 
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा। 
''कौन-सा मोड़?'' 
''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''
''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा। 
''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए। दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे। दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए। घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था ।।
पति पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जरा सी बात पर कोई ऐसा फैसला न लें कि आपको जिंदगी भर अफसोस हो ।।
https://www.facebook.com/respectnari/?ref=page_internal&fref=nf


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हिंदुस्तान, लखनऊ, 9 मार्च 2017 , पृष्ठ --- 14 

  


~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, June 13, 2017

1857 का अंतिम युद्ध जीत कर भी हार गया होपग्रांट ------ के पी सिंह

क्रांतिकारी बलभद्र के शहीदी दिवस पर :

साभार : 
नवभारत टाईम्स ,  लखनऊ, 01-06-2017,  पृष्ठ --- 12 



  ~विजय राजबली माथुर ©

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Friday, June 2, 2017

ब्लाग लेखन के सात वर्ष ------ विजय राजबली माथुर

  





सात वर्ष पूर्व आज ही के दिन इस 'क्रांतिस्वर ' ब्लाग को प्रारम्भ किया था। 1973 में पहली बार आगरा और मेरठ के स्थानीय अखबारों में मेरे लेख प्रकाशित हुये थे तब से जब तब अखबारों में लेख छपते रहे हैं। आगरा के 'सप्तदिवा ' साप्ताहिक से पहले सहायक फिर उप संपादक के रूप में भी सम्बद्ध रहा । आगरा के ही त्रैमासिक 'अग्रमंत्र ' से भी उप संपादक के रूप में सम्बद्ध रहा। आगरा के ही एक साप्ताहिक 'ब्रह्मपुत्र समाचार ' से भी एक लेखक के तौर पर सम्बद्ध रहा हूँ। आगरा में ही कायस्थ सभा और माथुर सभा की मेगजीन्स में भी मेरे लेख स्थान  पा सके हैं। लखनऊ आने पर भी एक स्थानीय  साप्ताहिक अखबार में लेख छ्पे लेकिन 02 जून 2010 से यह ब्लाग प्रारम्भ होने पर अखबारों को लेख न भेज कर ब्लाग पोस्ट्स के माध्यम से लिखने लगा और अब 'विद्रोही स्व-स्वर में ', 'कलम और कुदाल ', 'साम्यवाद (COMMUNIST)', 'सर्वे भवन्तु सुखिना :','सुर संगीत ' ब्लाग्स में लेखन चलता रहता है।  
'क्रांतिस्वर ' ब्लाग में इससे पूर्व 485 पोस्ट्स प्रकाशित हो चुकी हैं और अब तक 180327 विजिट्स हुई हैं । दूसरे विषयों पर दूसरे ब्लाग्स में लेखन के कारण इस ब्लाग पर लेखन अब कम हो रहा है। विचारों को लिखते रहना मेरा शौक है इसलिए लेखन चल रहा है। सबके सहयोग के लिए सबको धन्यवाद। 
~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, May 4, 2017

जब तक कारपोरेट के द्वारा सरकारों का नियंत्रण होता रहेगा ------ विजय राजबली माथुर

  
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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नौकरी से हटाये जाने के संदेह  के आधार पर आत्महत्या हो अथवा कारपोरेट कंपनी के स्टोर्स से नौकरी से हटाये जाने के बाद  इसका मूल कारण व्यापारियों / उद्योगपतियों / कारपोरेट के पक्ष में श्रम कानूनों  को श्रमिक विरोधी बनाया जाना है। 
1973-74 में मेरठ कालेज, मेरठ के ला के अध्यापक और वरिष्ठ वकील सिन्हा साहब ने ( जो कि, इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के रिश्तेदार थे ) अपने छात्रों  को जो  विशेष बातें बताईं थीं उनमें से दो बातों का ज़िक्र मेरे सहकर्मी गुप्ता जी ने मुझसे  इसलिए किया था क्योंकि, मैं राजनीति में दिलचस्पी रखता था। 
(1 ) रायबरेली से 1971 का  इन्दिरा जी का चुनाव रद्द हो सकता है। 
(2 ) सन 1980 के बाद से श्रम न्यायालयों में श्रमिकों के विरुद्ध फैसले होने लगेंगे। 
उनके दोनों आंकलन सही सिद्ध हुये थे। 
*जगमोहन लाल सिन्हा साहब जुड़ीशियल सर्विसेज द्वारा जुड़ीशियल मेजिस्ट्रेट नियुक्त हुये थे। सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार को एक याचिका द्वारा चुनौती दी गई तब तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी जी सिन्हा साहब को अपने साथ सुप्रीम कोर्ट लेकर गईं थीं । सिन्हा साहब ने अन्य तर्कों के अलावा यह भी दलील दी कि,  उनको अपनी नौकरी जाने की चिंता नहीं है, चिंता है तो यह कि,उनके जैसे अन्य मेजिस्ट्रेट्स द्वारा अब तक किए गए फैसलों का क्या होगा ? क्या वे सभी फैसले भी रद्द होंगे और उनसे जिनको जो हानि या लाभ हो चुका है उसका क्या होगा ? जस्टिस सिन्हा साहब के तर्कों से सुचेता कृपलानी जी जीत गईं थीं। वह निष्पक्ष और न झुकने वाले जज थे। 1969-70 में  वह मेरठ में ज़िला व सत्र न्यायाधीश थे उनसे मिलने तब के सी एम अपने जानने वाले की सिफ़ारिश लेकर पहुंचे थे। उन्होने अर्दली के जरिये पुछवाया कि, चौधरी चरण सिंह या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह हैं ? चौधरी साहब ने जवाब भिजवाया कि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जज साहब से मिलना चाहते हैं। सिन्हा साहब ने सी एम साहब से मिलने से इंकार कर दिया और बाद में फैसला भी उनके जानने वाले के खिलाफ गया। केस की इसी कमजोरी के चलते सी एम साहब जज साहब को प्रभावित करना चाहते थे जो वह नहीं हुये। इसीलिए 1975 में पी एम इन्दिरा जी के विरुद्ध भी फैसला लेने में उनको दिक्कत नहीं हुयी थी। 
* 1973- 74 में जिस करवट विश्व की आर्थिक गतिविधियां चल रही थीं उनके आधार पर ही प्रोफेसर / वकील सिन्हा साहब ने लेबर कोर्ट संबन्धित आंकलन अपने छात्रों को दिया था। जज सिन्हा साहब के फैसले के बाद देश में एमर्जेंसी लगा दी गई थी और  लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष बढ़ा कर छह वर्ष कर दिया गया था परंतु 1977 के मध्यवधी चुनावों में इन्दिरा जी को व्यक्तिगत व राजनीतिक शिकस्त का सामना करना पड़ा था। आर एस एस के तीन नेता  1 ) सुब्रमनियम स्वामी  पी एम मोरारजी के साथ, 2)ए बी बाजपेयी  गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह के साथ , 3) नानाजी  देशमुख जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर के साथ हो गए थे । इन तीनों ने संघ के निर्देश पर उन तीनों को टकरा दिया था और मोरारजी के बदले चौधरी साहब इन्दिरा जी के समर्थन से पी एम बना दिये गए थे। चौधरी साहब द्वारा इन्दिरा जी की चिकमङलूर की सदस्यता छीन कर उनको  जब एक माह के लिए ' तिहाड़ ' भिजवाया गया  था उसी दौरान एक और समांनांतर आर एस एस  ( राजनारायन संजय संघ ) का गठन आर एस एस की प्रेरणा से हुआ था। देवरस - इन्दिरा गुप्त समझौते के अंतर्गत 1980 के मध्यावधी  चुनावों  में आर एस एस ने अपना वोट इन्दिरा कांग्रेस को दिलवा कर इन्दिरा जी को पुनः पी एम बनवा दिया था। इंदिराजी की यह सरकार केवल हिन्दू वोटों से बनी पहली सरकार थी। उनकी हत्या के बाद 1985 के चुनावों में राजीव गांधी की सरकार आर एस एस  व हिन्दू वोटों के समर्थन से बनी दूसरी सरकार थी तब भाजपा को आर एस एस की रणनीति के तहत सिर्फ दो सीटें मिली थीं । इस सरकार के कार्यकाल में  पहले पहल केंद्र सरकार को कारपोरेट कल्चर पर चलाया गया जो आगे भी जारी रहा है। 
* जब 2014 में  2011 के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन के भरोसे आर एस एस व हिन्दू वोटों के जरिये  तीसरी सरकार मोदी साहब के नेतृत्व में बनी तब तक संसद व बाहर विपक्ष नितांत क्षीण हो चुका था। आर एस एस जो मूलतः बनियों ( व्यापारियों ) व ब्राह्मणों ( व्यापारियों के हितैषी ) का संगठन माना जाता रहा है आज खुल कर सरकार को कारपोरेट हितों में चलवा रहा है। विभिन्न कारपोरेट स्टोर्स व कंपनियों में कर्मचारियों  की निरंतर छटनी की जा रही है और इसके लिए कर्मचारियों से ही स्तीफ़ा लिखवाया जाता है। कर्मचारियों को जान बूझ कर ऐसे ऐसे टार्गेट दिये जाते हैं जो पूरे हो ही नहीं सकते हैं। नतीजा अपनी नौकरी गंवा कर कर्मचारियों को चुकाना पड़ता है , उनके परिवार का पालन कैसे हो ? इसी वजह से आत्महत्या की दुखद घटनाएँ  सामने आ रही हैं। 

जब तक कारपोरेट के द्वारा सरकारों का नियंत्रण होता रहेगा कर्मचारियों, श्रमिकों और साधारण जनता के साथ साथ छोटे कारोबारियों का जीवन उनके परिवारों सहित नारकीय ही बना रहेगा। 

~विजय राजबली माथुर ©